ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे जो अर्थ हीन । तथा स्वैर अर्जुन ।
उसे तामस ज्ञान । कहता हूं मैं ॥ ७८ ॥
ऐसे तामस ज्ञानको भी ज्ञान । कहते इसका भाव अर्जुन ।
कहते हैं जन्मांधके नयन । बडे विशाल जैसे ॥ ७९ ॥
अथवा बहरेके खडे कान । या अपेयको कहते हैं पान ।
वैसे कुल नाम उसका ज्ञान । इतना ही ॥ ५८० ॥
जाने दे कितना बोलना । ऐसी बातको कभी ज्ञान ।
न कहना उसे जानना । तामस मात्र ॥ ८१ ॥
गुणमें कहे ऐसे तीन । भेद कर यथा लक्षण ।
ऐसा श्रोता श्रेष्ठ अर्जुन । कहां है तुझसे ॥ ८२ ॥
ऐसे तीन प्रकार । ज्ञानके जो धनुर्धर ।
दीप्तिमें होगी गोचर । कर्ताकी क्रियाकी ॥ ८३ ॥
जैसे है बहता हुवा नीर । लेके जाता पात्रका आधार ।
उसी प्रकार लेता आकार । उसी भांतिका ॥ ८४ ॥
ज्ञान-त्रयके कारण । त्रिविध कर्म अर्जुन ।
होता है सात्विक सुन । कहता पहले ॥ ८५ ॥
नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
सात्विक कर्मका लक्षण—
स्वाधिकारानुसार जो आता । उसीमें वह संतोष पाता ।
पति-व्रतालिंगनसे पाता । पति जैसे ॥ ८६ ॥
जैसे सांवले रंगमें चंदन । प्रमदाकी आंखोंमें अंजन ।
वैसे स्वाधिकारका भूषण । नित्यकर्म ॥ ८७ ॥
निर्दिष्ट और निष्काम तजके राग-द्वेषको ।
किया असंग वृत्तीसे वह है कर्म सात्विक ॥ २३ ॥
७६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग