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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 847

इसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर ।
जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥
ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद ।
स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥
अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती ।
कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥
उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग ।
कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
सात्त्विक धृतिके लक्षण—
उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार ।
अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥
अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग ।
मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥
या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन ।
चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥
जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर ।
न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥
ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर ।
मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥
इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट ।
घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥
चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी ।
समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥
७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग