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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 851

ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव ।
निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
तीन प्रकारके सुखका विवेचन—
कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा ।
कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥
जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन ।
उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥
किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे ।
या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥
अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार ।
देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥
वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे ।
नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥
ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक ।
वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
सात्विक सुखका लक्षण—
जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ ।
या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥
कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके ।
अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥
आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम ।
आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥
७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग