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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 837

अपना सामर्थ्य न देखता । आगेका विचार न करता ।
मनमें जो आता सो करता । न देखता कुछ ॥ २१ ॥
मेरा सामर्थ्य कितना । कर्मकी कैसी है घटना ।
करने पर है क्या होना । सोचता नहीं ॥ २२ ॥
इस भांतिसे सब जो विचार । अविवेक पगसे पोंछकर ।
उद्यत होता है स-अहंकार । कर्ममें वह ॥ २३ ॥
अपना ही आसरा जलाकर । भड़कता है अग्नि भयंकर ।
या मर्यादा भंग कर सागर । उमड पड़ता ॥ २४ ॥
तब कम अधिक न जानता । आगे पीछे कुछ भी न देखता ।
पथ कुपथ भी एक करता । तामस कर्म ॥ २५ ॥
कृत्याकृत्य ऐसा कुछ लेकर । आप पर विचार भी न कर ।
होता है जो कर्म धनुर्धर । निश्चय ही तामस ॥ २६ ॥
ऐसे गुणत्रय भिन्न । कर्मकी स्थिति अर्जुन ।
यह किया विवेचन । कारणों सह ॥ २७ ॥
अब इन कर्मोंको जो करता । कर्मोंके अभिमानसे जो कर्ता ।
वह जीव भी कैसे त्रिविधता । पाता है देख ॥ २८ ॥
जैसे होके चतुर्थाश्रमवश । चतुर्धा दीखता एक पुरुष ।
कर्ता दीखता कर्मभेद वश । तीन प्रकारका ॥ २९ ॥
तीनमें अब मैं पार्थ । सात्विक तुझे प्रस्तुत ।
करता हो दत्त चित्त । सुन तू इसे ॥ ६३० ॥
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥
निःसंग निरहंकारी उत्साही धैर्यसे भरा ।
फले जले अविकारी कर्ता सात्विक है कहा ॥ २६ ॥
७६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद ग्रोग