ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक ।
अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥
उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें ।
प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥
जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता ।
प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥
या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता ।
व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥
वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय ।
उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥
जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान ।
निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥
फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त ।
निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥
ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक ।
जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥
वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि ।
कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
राजसिक बुद्धिका लक्षण—
बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे ।
या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥
कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो ।
न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥
७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग