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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 842

दूसरोंका सुख देख कर । मानता कष्ट अपने पर ।
जैसे लवण दूधमें गिर । करता अपेय ॥ ७५ ॥
अथवा जैसे ठंडे पदार्थ । आगमें पड़ कर पार्थ :
भड़कते मानो वही मूर्त । अग्नि ही है ॥ ७६ ॥
जैसे अच्छा भला आहार । पहुंच पेटके अंदर ।
बनता मल धनुर्धर । उसी भांति ॥ ७७ ॥
बना है कभी किसीका कुशल । देखके वह जानता है शूल ।
तथा उस बताके प्रतिकूल । आता बाहर ॥ ७८ ॥
गुण लेकर जो देता दोष । अमृतका करता है विष ।
दूध पिलाता उसको विष । देता जैसे सर्प ॥ ७९ ॥
सुख मिलेगा इस लोकमें । गति मिलेगी परलोकमें ।
कर्म आता ऐसे समयमें । ऐसे समय ॥ ६८० ॥
आती है उसको अपने आप । निद्रा रखी है जैसे सुखरूप ।
दुर्व्यवहारमें अपने आप । भागती है वह ॥ ८१ ॥
जैसे द्राक्षारस या आम्र-रस । खानेमें मुख चुराता वायस ।
तथा अंधा बनाता है दिवस । जैसे उलूकको ॥ ८२ ॥
वैसे कल्याण-काल जब देखता । तब उसको है आलस आता ।
प्रमादमें है स्फुरण चढ़ता । चाहता वैसे ॥ ८३ ॥
जैसे सदैव समुद्रका उदर । वडवाग्नि रखता है भरकर ।
वैसे है वह विषाद निरंतर । रखता अपनेमें ॥ ८४ ॥
लेंड़ककी आगमें धूमावधि । या अपानमें होती है दुर्गंधि ।
इसी भांति वह जीवनावधि । विषाद करता ॥ ८५ ॥
वैसे कल्पांतके भी पार । फल प्राप्ति हो धनुर्धर ।
ऐसे रखता है व्यापार- । अभिलाषा ॥ ८६ ॥
विश्वके उस पारकी चिंता । चितमें ही करता रहता ।
किंतु हाथमें नहीं लगता । तृण भी उसके ॥ ८७ ॥
ऐसे वह लोगोंमें पार्थ । पाप-पुंज ही होता मूर्त ।
देखना ऐसे अन्याहत । कर्त्ता तामस ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७०