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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 846

या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता ।
न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥
वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय ।
न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥
अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती ।
कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥
वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता ।
तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥
बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ ।
विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
तामसिक बुद्धिके लक्षण—
होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत ।
उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥
पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन ।
ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥
वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल ।
सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥
मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ ।
जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥
अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ ।
वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥

तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको
देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७४