ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रिय हो आत्माके समान । उसके लिये क्या अर्जुन ।
देहको दुःख होता मान । होगा क्या क्लेश ॥ ४३ ॥
विषय-सुख जैसे टूटता जाता । देह तथा बुद्धिका लय हो जाता ।
कर्ममें ही आनंद बढ़ता जाता । उसको सदैव ॥ ४४ ॥
ऐसा जब कर्म करता । कोई समय ऐसा आता ।
कर्म करना भी रुकता । उस समय ॥ ४५ ॥
कगार परसे जब गिरता रथ । टूटेगा मान सकुचाता नहीं पार्थ ।
वैसे मनमें नहीं होता संकुचित । किंचित भी वह ॥ ४६ ॥
अथवा मैंने जो कर्म किया । संपूर्ण रूपसे सिद्ध भया ।
ऐसे मैंने बडा जय पाया । यह भी नहीं मानता ॥ ४७ ॥
ऐसे जो कर्म करता । जहां कहीं देखा जाता ।
उसे कहना तत्वता । कर्ता सात्विक ॥ ४८ ॥
राजसका अब अर्जुन । कहता सुन पहचान ।
आकांक्षाका आश्रय-स्थान । बनता विश्वका ॥ ४९ ॥
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
राजस कर्ताके लक्षण—
गांवका सब कल्मश जैसे । घूरेपे एक होता है वैसे ।
या स्मशानपे आता गांवसे । सारा अमंगल ॥ ६५० ॥
उसी भांति है जो अशेष । विश्वका सभी अभिलाष ।
पद प्रक्षालन विशेष । हुवा है स्थान ॥ ५१ ॥
इसीलिये फल लाभ । होता है जहां सुलभ ।
हो जाता है वहां लोभ । ऐसे कार्यमें ॥ ५२ ॥
फल कामुक आसक्त लोभी अस्वच्छ हिंसक ।
हर्ष औ' शोकसे मारा कर्ता राजस है कहा ॥ २७ ॥
७६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग