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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 848

अधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर ।
बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥
संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट ।
बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥
इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण ।
स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥
मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान ।
बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥
फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती ।
तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥
यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती ।
ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
राजसी धृतिके लक्षण—
शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर ।
भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥
मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर ।
धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥
कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना ।
इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥
वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष ।
तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥
धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके ।
डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७६