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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 844

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
सात्त्विक बुद्धिके लक्षण-
तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया ।
वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥
वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल ।
प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥
इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम ।
तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥
ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता ।
करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥
वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा ।
मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥
इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति ।
इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥
तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता ।
या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥
नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता ।
या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥
निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा ।
वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥
कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय ।
तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥
क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय ।
धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७२