ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 849, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंयया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
तामसी धृतिके लक्षण—
सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे ।
कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥
अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान ।
नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥
नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल ।
वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥
सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन ।
अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥
आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता ।
पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥
तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण ।
पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥
पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता ।
पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥
जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश ।
इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥
ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी ।
इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥
तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम ।
तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥
निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद ।
ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥
७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग