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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 838

सात्विक कर्ताके लक्षण—
छोडकर फलोद्देश । जैसे बढ़ जाती शाख ।
चंदनका जो विशेष । कहाता बावनी ॥ ३१ ॥
या फल बिना ही जो सार्थक । होती है जैसे नाग लतिका ।
वैसे करता है नित्यादिक । कर्म सदैव ॥ ३२ ॥
उनमें नहीं फल-शून्यता । अथवा नहीं है विफलता ।
फलके भी फल पांडुसुता । होते हैं क्या ॥ ३३ ॥
आदर-पूर्वक सब करता । किंतु किया ऐसा न कहता ।
वर्षाकालमें नहीं गर्जता । बादल जैसे ॥ ३४ ॥
वैसे परमात्म-प्रीत्यर्थ । समर्पणमें जो उचित ।
कर्म-समुदाय है पार्थ । करनेमें उत्पन्न ॥ ३५ ॥
कालका उल्लंघन नहीं करता । शुद्ध स्थलका विचार भी रखता ।
तथा शास्त्र-दृष्टिसे भी देखता । कार्य निर्णय ॥ ३६ ॥
वृत्तिको सदा एकाग्र रखता । चित्तको फलसे दूर रखता ।
नियमोंका बंधन भी पालता । शास्त्रोक्त जो ॥ ३७ ॥
इस निरोधको सहनेमें । सर्वोत्कृष्ट धैर्यको मनमें ।
रखनेका सद् चिंतनमें । रहता है नित ॥ ३८ ॥
तथा आत्म-प्रेमसे विहित । कर्म करनेमें जो सतत ।
देह-सुखकी चिंता किंचित । करता नहीं ॥ ३९ ॥
निद्रासे सदा दूर रहता । भूखको भी नहीं जानता ।
देह-सुख नहीं मिलता । उसको कभी ॥ ६४० ॥
सोना जैसे आगमें तपता । भार घट कसमें चढ़ता ।
वैसे उत्साह बढ़ता जाता । कर्ममें उसका ॥ ४१ ॥
पति पर प्रेम हो तो सच । सतीको जीनेमें हो संकोच ।
चितामें जलनेमें रोमांच । होते पतीसह ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६६