ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
जैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता ।
वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥
जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना ।
वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥
गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर ।
तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥
पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे ।
तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥
या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती ।
जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥
या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर ।
जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥
लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे ।
इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥
अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे ।
सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥
यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा ।
न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥
किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता ।
करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥
अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल ।
यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥
उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ ।
ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥
योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल ।
उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८२
कौन करें उसका वर्णन । भव-द्रुमको अनित्य मान ।
चलता है पुरुष अर्जुन । इस भांति ॥ ४३ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
इस भव-द्रुमका फैलाव --
फिर यह प्रपंच रूप । अधः शाखा जो पादप ।
बढता जाता परंतप । ऊर्ध्वशाख हो ॥ ४४ ॥
तथा नीचे फैले जो डाल । उसमें फूटते हैं मूल ।
उस मूलमें फूटे वेल । पल्लवादिक ॥ ४५ ॥
अजी ! हमने पीछे ऐसे । उपक्रममें कहा जैसे ।
उसीको सहज रूपसे । कहते अब ॥ ४६ ॥
बद्धमूल है जो अज्ञानसे । महदादिकके शासनसे ।
बडे वेद-पर्ण फूटनेसे । फैला है अपार ॥ ४७ ॥
पहले इससे स्वेदज । जारज उद्भिज मणिज ।
मूळसे ही जो महाभुज । उठते चार ॥ ४८ ॥
इस एकेकसे अंकुर । फूटके अनेक प्रकार ।
जीवोंकी शाख बढ़ाकर । होते चौरासी लाख ॥ ४९ ॥
बढ़ते हैं खंड सरल । नाना सृष्टिकी डाल डाल ।
टेढी मेढी फूटती डाल । अनेक जातिकी ॥ १५० ॥
ऊंचे तले शाख विस्तार होता
औ' भोग पत्ते गुण-पुष्ठ होते ।
नये नये मूल फूले तले जो
नृलोकमें कर्म-निबन्ध कारी ॥ २ ॥
५८३ पुरुषोत्तमयोग
स्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक ।
टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥
वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें ।
वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥
शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर ।
और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥
ऊर्ध्वमूलका फट जाना—
आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर ।
जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥
जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर ।
मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥
न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके ।
टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥
विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव ।
डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥
ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित ।
बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥
संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ ।
अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥
पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता ।
तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥
तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक ।
फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥
वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड ।
बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८४
वैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर ।
तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥
तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख ।
फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥
अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ ।
उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥
बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम ।
गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥
प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार ।
करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥
तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट ।
तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥
चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट ।
फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥
उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार ।
टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥
ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव ।
देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥
हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख ।
निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥
ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण ।
इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥
अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न ।
वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥
तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल ।
आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥
(74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग
वैसे ऊर्ध्वका जो पार्थ । आदि मूल देखा जाता ।
आदिसे ये हैं मध्यस्थ । शाखायें सब ॥ ७६ ॥
किंतु तामस सात्विक । सुकृत दुष्कृतात्मक ।
फैल जाती हैं जो शाख । अध-ऊर्ध्वकी ॥ ७७ ॥
तथा वेद-त्रयके हैं पान । अन्यत्र न लगते अर्जुन ।
मनुष्य बिन अन्य विधान । नहीं उसका ॥ ७८ ॥
इसलिये मनुष्यका तन । ऊर्ध्व-मूलकी शाखा है मान ।
इस कर्म-वृद्धिके कारण । वही मूल ॥ ७९ ॥
फैलती शाखायें जब वृक्षोंमें । जड़ जाती हैं गहरी पृथ्वीमें ।
जड़ गड़ी जाती हैं जैसे पृथ्वीमें । वृक्ष फैलता ऊपर ॥ १८० ॥
उसी भांति है यह शरीर । कर्मके साथ देह संसार ।
देह है तब तक व्यापर । चलता रहता ॥ ८१ ॥
तब है मनुष्य देह पार्थ । इसकी जड़ कहना सार्थ ।
यहां यह बोलना यथार्थ । श्रीकृष्णका जो ॥ ८२ ॥
फिर है तमका दारुण । रुक जाता जब तूफान ।
सत्वका छूटता सत्राण । चंड मारुत ॥ ८३ ॥
उस समय यह मनुष्याकार । जड़में छूटता सुगंध अंकुर ।
उसमें फूटते मुकुल अपार । नव नव कोंपल ॥ ८४ ॥
विकसित ज्ञानके कारण । प्रज्ञा-कुशलताके जो तीक्ष्ण ।
अंकुर फूटते प्रति-क्षण । फैलते हुए ॥ ८५ ॥
बुध्दिके शाखोपशाख । स्फूर्तिंसे बलसे नेक ।
प्रकाशसे सविवेक । खिलते हैं ॥ ८६ ॥
मेधा-रससे वहां भरपूर । आस्था-पल्लवसे खिले सुंदर ।
सरल निकलते हैं अंकुर । सद्वृत्तिके ॥ ८७ ॥
सदाचारके तब अनेक । कोमल कोंपल सुवासिक ।
गूंजते हैं सदा वेद घोष । उन पल्लवोंसे ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८६
शिष्ट आगम विधान । विविध याग वितान ।
ऐसे पल्लव अर्जुन । बढ़ते जाते ॥ ८९ ॥
अनेक गुच्छ ऐसे यम-दमके । लगते हैं जब तप टहनीके ।
तथा आलिंगन करते उसके । वैराग्यकी टहनियां ॥ ९० ॥
विशिष्ट व्रतोंकी जो शाख । तीक्ष्ण धैर्यांकुरमें देख ।
जन्म-वेगसे ऊर्ध्वमुख । उठते जाते ॥ ९१ ॥
करते पल्लव वेद-गर्जन । सद्विद्याओंका घोष महान ।
जब बहता है वायु अर्जुन । सात्विकताका ॥ ९२ ॥
अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका विवेचन-
वहां धर्म-शाखाओंमें विस्तृत । जन्म-शाखा जो सरल दर्शित ।
उसमें स्वर्गादिक फलयुक्त । शाखा फैलती अनेक ॥ ९३ ॥
फिर उपरति रक्त-वर्ण । उसमें शाखा नित नवीन ।
बढती लहराके अर्जुन । धर्म-मोक्षकी ॥ ९४ ॥
फिर रवि-चंद्रादि ग्रह-वर । पितर ऋषि आदि विद्याधर ।
फूटती नाना शाखा चहूं ओर । विस्तार पूर्वक ॥ ९५ ॥
इससे भी ऊंचाई पर । इंद्रादि शाख श्रेष्ठतर ।
फलादिसे जो भर कर । बढती अनेक ॥ ९६ ॥
इसके ऊपर भी है शाख । तप-ज्ञानसे बढी है देख ।
अत्रि मरीचि कश्यपादिक । ऊर्ध्व हैं अति ॥ ९७ ॥
उत्तरोत्तर उस प्रकार । ऊर्ध्व-शाखाओंका है प्रसार ।
छोटे मूलमें बड़ा अपार । फळता जाता ॥ ९८ ॥
ऊर्ध्व-शाखाओंके अग्रपर । आता फल भार धनुर्धर ।
ब्रह्मेश जैसे महा अंकुर । फूटते नुकीले ॥ ९९ ॥
फूलोंके अति भारसे । झुकता है ऊपरसे ।
तथा लगता मूलसे । जैसे हो मूलमें ॥ २०० ॥
वैसे भी प्रकृत जो रुख । फल-भारसे लदी शाख ।
झुककर आती है देख । जडके पास ॥ १ ॥
५८७ पुरुषोत्तमयोग
जहांसे इसका विस्तार । प्रारंभ हुवा धनुर्धर ।
मिलता है वही आकार । ज्ञान-योगसे ॥ २ ॥
इसीलिये सुन ब्रह्मेशके । बाद बढ़ना नहीं जीवके ।
वहांसे ऊपर है जिसके । ब्रह्मही केवल ॥ ३ ॥
इस भांति धनंजया । ब्रह्मादिक टहनियां ।
ऊर्ध्व-मूल जो है माया । उससे नहीं तुलती ॥ ४ ॥
और भी ऊपर जो शाख । जिसके नाम सनकादिक ।
फल-मूलमें न आती देख । भरी है ब्रह्ममें ॥ ५ ॥
ऐसे मनुष्यसे जानना पार्थ । ऊर्ध्वमें हैं जो ब्रह्मादिक पात ।
बढ़ जाती इसकी शाखा-जात । सविस्तर ऊंची ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वके हैं जो ब्रह्मादि । मनुष्य उसके आदि ।
इसीलिये कहा आदि । मूल इसके ॥ ७ ॥
ऐसा तुझे अलौकिक । दिखाया है ऊर्ध्व शाख ।
कह यह भव रूख । ऊर्ध्वमूल ॥ ८ ॥
संसार वृक्ष उन्मूलन कैसे करना—
तथा आदिका भी है जो मूल । उत्पत्ति सह कहा सकल ।
अब सुनो करना उन्मूल । कैसे यह ॥ ९ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
न रूप इसका दीखे किसीको
न मूल है या न तना न शाखा ।
विरक्तिका ले कर तीव्र शस्त्र
काटें इसे जो दृढ-मूल वृक्ष ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८८
किंतु यहां अर्जुन । सोचेगा तेरा मन ।
काटनेका साधन । क्या है इसका ॥ २१० ॥
अंत तक है ब्रह्मका । ऊर्ध्व शाखायें उसका ।
औ' अरूपमें जिसका । ऊर्ध्व-मूल ॥ ११ ॥
स्थावरादिसे इसका तल । फैलाता जाता अनेक डाल ।
फिर दौड़ते दूसरे मूल । मनुष्य रूपमें ॥ १२ ॥
ऐसा गहरा और विस्तृत । कौन करेगा इसका अंत ।
ऐसा नहीं लाना क्षुद्र बात । अपने मनमें ॥ १३ ॥
इसको उखाडना कौनसी बात । इसमें आयास नहीं किंचित ।
बच्चोंको करने क्या भय-मुक्त । दूर भगाना क्या हौवेको ॥ १४ ॥
गंधर्व नगरोंको क्या गिराना । खरहेके सींगोंको क्या तोडनां ।
यदि होता है उसे तोड़ना । आकाश पुष्प ॥ १५ ॥
ऐसे है यह रूख । सत्य नहीं है देख ।
रहा क्या है जो निःशेष । करना उसे ॥ १६ ॥
हमने कहा जो इसका प्रकार । करते समय मूलका विस्तार ।
वंध्या संतति खेलती घरभर । वैसे ही है यह ॥ १७ ॥
होते ही जब जागृत । क्या रही स्वप्नकी बात ।
वैसे ही है वह पार्थ । पोला वृक्ष ॥ १८ ॥
अजी ! जैसे अब मैंने कहा था । इसका दृढ मूल यदि होता ।
तथा वैसा ही यदि यह होता । वास्तविक वृक्ष ॥ १९ ॥
तथा किस मायका संतान । कर सकते हैं उन्मूलन ।
अजी ! फूंकनेसे क्या गगन । उड़जायेगा ॥ २२० ॥
इसीलिये यहां धनंजया । यहां जिसका बखान किया ।
जैसे कूर्मिके घृतसे किया । आथित्य राजाका ॥ २१ ॥
अजी ! मृगजलका सरोवर । दूरसे ही दीखता सुन्दर ।
होता क्या मृग-जल सींचकर । फलोंका बाग ॥ २२ ॥
५८९ पुरुषोत्तमयोग
मूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान ।
तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥
इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ ।
यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥
जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता ।
तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ ।
तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥
जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित ।
तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥
जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त ।
या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥
वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता ।
तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥
अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ ।
उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥
संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं ।
तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥
होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान ।
नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥
अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं ।
तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥
अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र ।
नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥
आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन ।
तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९०
जैसे घटका अनास्तित्व । किये बिना ही अस्तित्व ।
जैसे जान तू अनादित्व । इस वृक्षका ॥ ३६ ॥
अर्जुन देख तू यही । इसका आद्यंत नहीं ।
मध्यका भास जो वही । मात्र है भास ॥ ३७ ॥
ब्रह्म-गिरिसे निकलता । तथा समुद्रसे न मिलता ।
किंतु मध्यमें है भास होता । मृगांबुका जैसा ॥ ३८ ॥
अजी ! आद्यंतकी नहीं बात । तथा कहो नहीं होता पार्थ ।
किंतु अनस्तित्वसे प्रतीत । होते है यह ॥ ३९ ॥
जैसे अनेक रंगोंसे युक्त । इंद्र-धनुष होता दर्शित ।
वैसे होता है यह प्रतीत । अज्ञानीको ॥ २४० ॥
स्थितिकालमें यह फंसाता । ज्ञानीकी आंखोंमें भरता ।
कफनी पहन कर आता । बहुरूपी जैसे ॥ ४१ ॥
नहीं होते हुए अर्जुन । नीलिमा दिखाता गगन ।
वह भी क्षणभर मान । वैसे ही ॥ ४२ ॥
स्वप्नके वस्तु अनसक्त । यदि मान लिये वे सत्त ।
वैसे आभास यहां पार्थ । मिलता क्षणिक ॥ ४३ ॥
देखनेमें दीखता है सुंदर । पकडने जाता जब वानर ।
नहीं मिलता जैसे धनुर्धर । जलका बिंब ॥ ४४ ॥
तरंग-भंग होता न्यून । विद्युद्गति अल्प अर्जुन ।
इससे तीव्र-गति जान । इसके भासकी ॥ ४५ ॥
मारुत जैसे ग्रीष्मांतका । न जानते आगे पीछेका ।
इसी भांति इस वृक्षका । नहीं स्थैर्य ॥ ४६ ॥
नहीं इसका सृष्टि स्थिति लय । वैसे ही रूप नहीं धनंजय ।
तब इसका उन्मूलन कार्य । कठिन कैसे ॥ ४७ ॥
५९१ पुरुषोत्तमयोग
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ—
अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल ।
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥
ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख ।
उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥
फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको ।
तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥
वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर ।
उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥
तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी ।
औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥
अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर ।
तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥
जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय ।
अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥
लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन ।
करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥
होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान ।
मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥
यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण ।
अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥
फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण ।
प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥
फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना ।
फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९२
फिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल ।
तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥
अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर ।
न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥
आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर ।
न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥
शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर ।
या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥
अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत ।
स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥
तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल ।
न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥
इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार ।
तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना-
फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता ।
यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥
ढूंढे वही जो पद है महान
पीछे जहांसे मुडना न होता ।
विलीन होना उस रूपमें ही
प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥
५९३ पुरुषोत्तमयोग
(75)
किंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर ।
रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥
यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना ।
रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥
अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब ।
अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥
अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता ।
वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥
जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना ।
वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥
या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना ।
अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥
अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत ।
वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥
न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना ।
महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥
वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार ।
नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥
संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार ।
जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥
करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड ।
पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥
अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व ।
आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥
आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान ।
न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥
ज्ञानेश्वरी ५९४
अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार ।
व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥
कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना ।
हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥
और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका ।
उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥
किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे ।
महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं—
जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान ।
वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥
जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर ।
वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥
उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल ।
क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥
वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता ।
वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥
जो मान मोहासह संग-दोष
उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ ।
निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त
वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥
५९५ पुरुषोत्तमयोग
जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन ।
उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥
जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता।
वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥
जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण ।
वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥
पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता ।
द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥
अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर ।
उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥
स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण ।
न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥
वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप ।
न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥
तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर ।
करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥
वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर ।
खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥
आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे ।
एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥
तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका ।
प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥
या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण ।
न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥
जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर ।
उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९६
निकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल ।
उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥
षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण ।
वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥
निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण ।
वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥
एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे ।
यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥
मेरा वह परम पद—
वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां ।
न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥
दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता ।
अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे ।
अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥
ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता ।
जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥
खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन ।
या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥
श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक ।
उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥
प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी ।
न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥
५९७ पुरुषोत्तमयोग
तेजकी वह महा-रास । सर्व-भूतात्मक निवास ।
चंद्र-सूर्यका भी मानस । उजलाता है ॥ १२॥
तभी चंद्र सूर्य हैं स्फुलिंग । उस प्रकाशके हैं अंग ।
सभी तेज हैं उसके भाग । जो है तेजस्वी ॥ १३ ॥
तथा होते ही जिसका उदय । लोपता विश्व सह चंद्र-सूर्य ।
जैसे होते ही सूर्यका उदय । लोपते चंद्र तारा ॥ १४ ॥
अथवा आते ही जागृति काल । मिटता है स्वप्न-राज्य विशाल ।
तथा नहीं रहता मृग-जल । सूर्यास्तमें जैसे ॥ १५ ॥
उस तत्वके पास । नहीं कोई आभास ।
परम धाम खास । मेरा वह ॥ १६ ॥
जो जो कोई वहां गये । लौट कर नहीं आये ।
सागरमें मिल गये । स्रोत जैसे ॥ १७ ॥
अथवा नमकका कुंजर । डूब गया लवण सागर ।
कभी न आयेगा लौटकर । उसी भांति ॥ १८ ॥
या पहुंची जो अंतराल । नहीं लौटती अग्नि-ज्वाल ।
तप्त लोहेपे पड़ा जल । न लौटता जैसे ॥ १९ ॥
वैसे मुझसे हुवा मिलन । ज्ञानाग्निमें शुध्द जो अर्जुन ।
नहीं होगा पुनरागमन । उसका कभी ॥ ३२० ॥
ब्रह्म लीन हो कर जो नहीं लौटते वे मूलतः अभिन्न है या भिन्न ?--
कहता प्रज्ञा-भूमि-पति पार्थ । जी जी प्रसाद किंतु एक बात ।
विनय करता हूं देना चित्त । कृपा पूर्वक ॥ २१ ॥
प्रभुसे जो स्वयं एक होते । तथा लौटकर नहीं आते ।
वे प्रभुसे हैं अभिन्न होते । अथवा भिन्न ॥ २२ ॥
यदि भिन्न ही है अनादि सिध्द । तो नहीं आते यह असंबध्द ।
सुमनमें जाकर ही षट्पद । सुमन होगा कैसे ? ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९८
अजी ! लक्ष्यसे जो भिन्न ऐसे । बाण लक्ष्य स्पर्श कर जैसे ।
लौटकर आते ही हैं जैसे । आयेंगे ही ॥ २४ ॥
या वे तू ही है स्वभावसे । किसको मिलना किससे ।
अपनेको आप शस्त्रोंसे । कैसे चितेरें ॥ २५ ॥
यदि हैं तुझसे अभिन्न जीव । तेरा ही संयोग वियोग देव ।
नहीं कहा जाता है अवयव । शरीरसे जैसे ॥ २६ ॥
तथा जो सदा भिन्न हैं तुझसे । नहीं मिल सकते कभी वैसे ।
फिर लौटते हैं या नहीं वहांसे । यह बात है व्यर्थ ॥ २७ ॥
तब तेरा रूप देख कर । नहीं आते हैं जो लौट कर ।
वह कौन कह कृपा कर । विश्वतोमुख देव ॥ २८ ॥
वह संदेह जो अर्जुनका । सुन शिरोमणि सर्वज्ञका ।
तुष्ट हुवा अपने शिष्यका । बोध देख कर ॥ २९ ॥
कहते हैं तब महामते । मुझे पाकर जो न लौटते ।
उनमें दोनों भांतिके होते । भिन्न औ' अभिन्न ॥ ३० ॥
जीव मुझसे अभिन्न भिन्न हैं-
देखा तो यदि गहराईसे । मैं हूं वे समरसैक्यसे ।
तथा देखे तो ऐसे या वैसे । मुझसे भिन्न ॥ ३१ ॥
जैसे पानीसे भिन्न सकल । दीखते हैं उठते कलोल ।
नहीं तो तरंग केवल । पानी ही पानी ॥ ३२ ॥
अथवा स्वर्णसे हैं भिन्न । दीखते हैं सब भूषण ।
किंतु वह स्वर्ण ही स्वर्ण । संपूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
वैसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे । अभिन्न सदा हैं मुझसे ।
भिन्नता दीखती जिससे । वह है अज्ञान ॥ ३४ ॥
देखें यदि आत्म-दृष्टिसे । मुझे छोड़ दूसरा कैसे ।
भिन्नाभिन्न व्यवहारसे । जानेगा जो ॥ ३५ ॥
५९९ पुरुषोत्तमयोग
सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर ।
तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥
अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर ।
कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥
किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन ।
रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥
गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार ।
घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥
अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर ।
अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥
या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन ।
कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥
उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न ।
विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥
ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना—
ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना ।
जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥
वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार ।
वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥
वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता ।
मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥
जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन ।
खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६००
किंतु जो जीवका बोध देता । हलनल प्रकट करता ।
तभी वह शब्द अर्थ देता । लोकमें जीव ॥ ४६ ॥
जन्मना तथा मरना । इसको सच मानना ।
मेरा संसार कहना । यह जीवलोक ॥ ४७ ॥
ऐसे जीवलोकमें अर्जुन । करता मेरा अवलोकन ।
जैसे चन्द्रमा नीरमें जान । जो उदकातीत ॥ ४८ ॥
जैसे कभी कोई स्फटिक । केशर पर पड देख ।
प्रकट होता लाल देख । किंतु न होता लाल ॥ ४९ ॥
वैसे अनादिपन नहीं टूटता । अकर्तापन मेरा नहीं भंगता ।
किंतु कर्ता भोक्ता ऐसा भासता । यह भ्रम है जान ॥ ३५० ॥
या आत्मा है जो निर्विकार । प्रकृतिसे हो एकाकार ।
प्रकृतिके धर्मानुसार । देखता अपनेमें ॥ ५१ ॥
मन सह सभी इंद्रिय । करते प्रकृतिका कार्य ।
उन्हें अपना धनंजय । होना प्रवृत्त ॥ ५२ ॥
स्वप्नमें जैसे कोई परिव्राजक । आप अपना कुटुंब होके देख ।
भागदौड़ करता मोह मूलक । जैसे वैसे भी ॥ ५३ ॥
वैसे है अपनी ही विस्मृति । आत्मा आप ही होता प्रकृति ।
उसीको मान सुभद्रापति । भजता उसीको ॥ ५४ ॥
मन रथ पर चढ़कर । श्रवण द्वारसे हो बाहर ।
शब्द-काननमें भयंकर । घुसता है वह ॥ ५५ ॥
वैसे ही प्रकृतिकी रास । त्वचाके हाथमें दे खास ।
स्पर्श-द्वारसे है प्रवास । करता वनमें ॥ ५६ ॥
अजी ! कभी किसी अवसर । नेत्र-द्वारसे पड़ बाहर ।
चढ़ता है रूपका डोंगर । स्वैर-भावसे ॥ ५७ ॥
वैसे ही रसनाका पथ । चलकरके वह पार्थ ।
रस भरने उदरार्थ । लगता वह ॥ ५८ ॥
६०१ पुरुषोत्तमयोग
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