ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजहांसे इसका विस्तार । प्रारंभ हुवा धनुर्धर ।
मिलता है वही आकार । ज्ञान-योगसे ॥ २ ॥
इसीलिये सुन ब्रह्मेशके । बाद बढ़ना नहीं जीवके ।
वहांसे ऊपर है जिसके । ब्रह्मही केवल ॥ ३ ॥
इस भांति धनंजया । ब्रह्मादिक टहनियां ।
ऊर्ध्व-मूल जो है माया । उससे नहीं तुलती ॥ ४ ॥
और भी ऊपर जो शाख । जिसके नाम सनकादिक ।
फल-मूलमें न आती देख । भरी है ब्रह्ममें ॥ ५ ॥
ऐसे मनुष्यसे जानना पार्थ । ऊर्ध्वमें हैं जो ब्रह्मादिक पात ।
बढ़ जाती इसकी शाखा-जात । सविस्तर ऊंची ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वके हैं जो ब्रह्मादि । मनुष्य उसके आदि ।
इसीलिये कहा आदि । मूल इसके ॥ ७ ॥
ऐसा तुझे अलौकिक । दिखाया है ऊर्ध्व शाख ।
कह यह भव रूख । ऊर्ध्वमूल ॥ ८ ॥
संसार वृक्ष उन्मूलन कैसे करना—
तथा आदिका भी है जो मूल । उत्पत्ति सह कहा सकल ।
अब सुनो करना उन्मूल । कैसे यह ॥ ९ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्
असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
न रूप इसका दीखे किसीको
न मूल है या न तना न शाखा ।
विरक्तिका ले कर तीव्र शस्त्र
काटें इसे जो दृढ-मूल वृक्ष ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८८