ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर निश्चयका मुष्टि-बल । देखना एक दो बार तौल ।
तब उसे धरना निश्चल । मनन तक ॥ २६० ॥
अपनेसे जब हथियार । निज-ध्याससे एक होकर ।
न रहेगा दौडने दूसरा । अपनेसे आगे ॥ ६१ ॥
आत्म-ज्ञानकी जो तलवार । अद्वयानुभव फैलाकर ।
न रहेगा भव-तरुवर । कहीं भी कभी ॥ ६२ ॥
शरदागमनका समीर । करता जैसे स्वच्छ अंबर ।
या उदित हो रवि अंधार । निगलता जैसे ॥ ६३ ॥
अथवा होते ही जागृत । होता जैसे स्वप्नका अंत ।
स्वबोध धारसे अश्वत्थ । कहीं रहता नहीं ॥ ६४ ॥
तब ऊर्ध्व या अधका मूल । नीचेका भी तब शाखा-जाल ।
न दीखता जैसे मृगजल । चांदनीमें वैसे ॥ ६५ ॥
इस प्रकार तू धनुधर । आत्म-ज्ञानकी ले तलवार ।
तोडकर यह तरुवर । ऊर्ध्वमूलका ॥ ६६ ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥ ४ ॥
फिर अपनेमें अपना रूप आप देखना-
फिर "इदं"का संबंध नहीं होता । "अहंत्व"के बिन जो प्रसिद्ध होता ।
यह अपना ही रूप है देखता । आप ही आप ॥ ६७ ॥
ढूंढे वही जो पद है महान
पीछे जहांसे मुडना न होता ।
विलीन होना उस रूपमें ही
प्रवृत्ति निकली जहां अनादि ॥ ४ ॥
५९३ पुरुषोत्तमयोग
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