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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 666

किंतु दर्पणका ले आधार । तथा एकका दूसरा कर ।
रूप देखते हैं जो गंवार । वैसा नहीं यह ॥ ६८ ॥
यह ऐसे देखना है अर्जुन । कूंआ खोदनेसे पूर्व झरना ।
रहता है आप भरा हो पूर्ण । अपनेमें जैसे ॥ ६९ ॥
अथवा सूखने पर अंभ । निज-बिंबमें ही प्रतिबिंब ।
अथवा मिल जाता है नभ । घटाभावमें ॥ २७० ॥
अग्निका इंधनांश समाप्त होत । अग्नि जैसेमूल रूपमें लौटता ।
वैसे ही अपनेको देखना होता । आप ही स्वयं ॥ ७१ ॥
जिह्वाको अपना ही रस चखना । दृष्टिको अपना ही रूप देखना ।
वैसे उसका निरीक्षण करना । अपनेको ही ॥ ७२ ॥
या प्रकाशसे प्रकाशका मिलना । गगनमें गगनका है चढ़ना ।
अथवा पानीसे पानीकी भरना । अपनी गोद ॥ ७३ ॥
अपनेको आप लक्षित । करता है जब अद्वैत ।
वह ऐसे होता है पार्थ । कहता हूं मैं ॥ ७४ ॥
न देखते ही जो देखना । कुछ न जानते ही जानना ।
महापद जो है अर्जुन । आदि पुरुषका ॥ ७५ ॥
वहां भी उपाधिका ले आधार । होती वर्णनमें श्रुति तैयार ।
नाम रूपका गडबड फिर । करती है व्यर्थकी ॥ ७६ ॥
संसार स्वर्गसे जो उकता कर । मुमुक्षुके ज्ञान योगका आधार ।
जहां जाने निकले पांडुकुमार । प्रतिज्ञा-पूर्वक ॥ ७७ ॥
करते हैं संसारके आगे दौड़ । वे वीत-राग पुरुष कर होड ।
पीछे डालते ब्रह्म-लोकको गाड । अतिक्रमण कर ॥ ७८ ॥
अहंकार आदि जो भाव । तज कर अपना सर्व ।
आज्ञा-पत्र लेते पांडव । मूल गृहका ॥ ७९ ॥
आत्म विषयमें जो अज्ञान । लाया बड़ा संसारका ज्ञान ।
न था जो उसने दिया स्थान । मैं तू पनको ॥ २८० ॥
ज्ञानेश्वरी ५९४