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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 658

वैसे ऊर्ध्वका जो पार्थ । आदि मूल देखा जाता ।
आदिसे ये हैं मध्यस्थ । शाखायें सब ॥ ७६ ॥
किंतु तामस सात्विक । सुकृत दुष्कृतात्मक ।
फैल जाती हैं जो शाख । अध-ऊर्ध्वकी ॥ ७७ ॥
तथा वेद-त्रयके हैं पान । अन्यत्र न लगते अर्जुन ।
मनुष्य बिन अन्य विधान । नहीं उसका ॥ ७८ ॥
इसलिये मनुष्यका तन । ऊर्ध्व-मूलकी शाखा है मान ।
इस कर्म-वृद्धिके कारण । वही मूल ॥ ७९ ॥
फैलती शाखायें जब वृक्षोंमें । जड़ जाती हैं गहरी पृथ्वीमें ।
जड़ गड़ी जाती हैं जैसे पृथ्वीमें । वृक्ष फैलता ऊपर ॥ १८० ॥
उसी भांति है यह शरीर । कर्मके साथ देह संसार ।
देह है तब तक व्यापर । चलता रहता ॥ ८१ ॥
तब है मनुष्य देह पार्थ । इसकी जड़ कहना सार्थ ।
यहां यह बोलना यथार्थ । श्रीकृष्णका जो ॥ ८२ ॥
फिर है तमका दारुण । रुक जाता जब तूफान ।
सत्वका छूटता सत्राण । चंड मारुत ॥ ८३ ॥
उस समय यह मनुष्याकार । जड़में छूटता सुगंध अंकुर ।
उसमें फूटते मुकुल अपार । नव नव कोंपल ॥ ८४ ॥
विकसित ज्ञानके कारण । प्रज्ञा-कुशलताके जो तीक्ष्ण ।
अंकुर फूटते प्रति-क्षण । फैलते हुए ॥ ८५ ॥
बुध्दिके शाखोपशाख । स्फूर्तिंसे बलसे नेक ।
प्रकाशसे सविवेक । खिलते हैं ॥ ८६ ॥
मेधा-रससे वहां भरपूर । आस्था-पल्लवसे खिले सुंदर ।
सरल निकलते हैं अंकुर । सद्वृत्तिके ॥ ८७ ॥
सदाचारके तब अनेक । कोमल कोंपल सुवासिक ।
गूंजते हैं सदा वेद घोष । उन पल्लवोंसे ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८६