ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकौन करें उसका वर्णन । भव-द्रुमको अनित्य मान ।
चलता है पुरुष अर्जुन । इस भांति ॥ ४३ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
इस भव-द्रुमका फैलाव --
फिर यह प्रपंच रूप । अधः शाखा जो पादप ।
बढता जाता परंतप । ऊर्ध्वशाख हो ॥ ४४ ॥
तथा नीचे फैले जो डाल । उसमें फूटते हैं मूल ।
उस मूलमें फूटे वेल । पल्लवादिक ॥ ४५ ॥
अजी ! हमने पीछे ऐसे । उपक्रममें कहा जैसे ।
उसीको सहज रूपसे । कहते अब ॥ ४६ ॥
बद्धमूल है जो अज्ञानसे । महदादिकके शासनसे ।
बडे वेद-पर्ण फूटनेसे । फैला है अपार ॥ ४७ ॥
पहले इससे स्वेदज । जारज उद्भिज मणिज ।
मूळसे ही जो महाभुज । उठते चार ॥ ४८ ॥
इस एकेकसे अंकुर । फूटके अनेक प्रकार ।
जीवोंकी शाख बढ़ाकर । होते चौरासी लाख ॥ ४९ ॥
बढ़ते हैं खंड सरल । नाना सृष्टिकी डाल डाल ।
टेढी मेढी फूटती डाल । अनेक जातिकी ॥ १५० ॥
ऊंचे तले शाख विस्तार होता
औ' भोग पत्ते गुण-पुष्ठ होते ।
नये नये मूल फूले तले जो
नृलोकमें कर्म-निबन्ध कारी ॥ २ ॥
५८३ पुरुषोत्तमयोग