ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमूल अज्ञान ही अस्तित्व हीन । उसका कार्य हो कैसे महान ।
तब संसार-वृक्षकी अर्जुन । कथा कैसी ॥ २३ ॥
इसका नहीं है अंत । यह कहना भी पार्थ ।
यह है यहां यथार्थ । एक रूपसे ॥ २४ ॥
जब तक नहीं जगता । निद्राका अंत नहीं होता ।
तब तक नहीं प्रकाशता । अंत न हो रातका ॥ २५ ॥
इसी प्रकार जान तू पार्थ । विवेक उठाता माथ ।
तब रहता अश्वत्थ । भव रूप ॥ २६ ॥
जब तक वायु शांत । रहता नहीं निश्चित ।
तब तक है अनंत । कहाता तरंग ॥ २७ ॥
जैसे होता सूर्यका अस्त । मृग-जल भास समाप्त ।
या बुझती है दीप-ज्योत । मिटता प्रकाश ॥ २८ ॥
वैसे मूल अविद्याको निगलता । ज्ञान जब है वह प्रकट होता ।
तभी संसार-वृक्षका अंत होता । अन्यथा नहीं ॥ २९ ॥
अनादि है इसका अर्थ । केवल शाब्दिक नहीं पार्थ ।
उपरोक्त दृष्टिसे यथार्थ । जानना यहां ॥ ३०• ॥
संसार-वृक्षका नहीं । स्वरूपका पता कहीं ।
तब आरंभ भी कहीं । होगा कैसे ॥ ३१ ॥
होता जो जहांसे उत्पन्न । वहां उसका आदि जान ।
नहीं जिसका जन्म-स्थान । कहां मूल ॥ ३२ ॥
अजी ! जिसका जन्म है नहीं । अस्तित्वका कहीं पता नहीं ।
तभी यह अनित्यत्वसे ही । है अनादि ॥ ३३ ॥
अजी ! जो है बांझिनीका पुत्र । उसका कहां है जन्म-पत्र ।
नभमें नीली माटी सर्वत्र । कहना कैसे ॥ ३४ ॥
आकाश-कुसुमका अर्जुन । डंटल तोडेगा कहो कौन ।
तभी यह भवद्रुम जान । कहना अनादि ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९०