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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 664

आत्म-ज्ञानका ले करवाळ—
अपना ही अज्ञानका बल । लेके हुवा यह दृढ-मूल ।
आत्म-ज्ञानका ले करवाळ । तोडना इसे ॥ ४८ ॥
ज्ञान छोड करके एक । करनेसे उपाय देख ।
उलझेगा तू अधिक । इसी वृक्षमें ॥ ४९ ॥
फिर कितने शाखसे शाखको । उछलेगा अध और ऊर्ध्वको ।
तभी काट तू अज्ञान मूलको । सम्यक्-ज्ञानसे ॥ २५० ॥
वैसे ही डोरका विषधर । मारने किया लठियोंका ढेर ।
उससे होगा केवल भार । व्यर्थका जो ॥ ५१ ॥
तैरने गंगा मृग-जलकी । दौड-धूप की नांव लानेकी ।
औ' लगाई नालेमें डुबकी । जो था यथार्थ ॥ ५२ ॥
अस्तित्व हीन जो संसार । नाशने किये श्रम घोर ।
तथा उसीमें धनुर्धर । गया आप ॥ ५३ ॥
जैसे नाशने स्वप्नका भय । जगना उपाय धनंजय ।
अज्ञान मूलका है उपाय । ज्ञान खड्ग ॥ ५४ ॥
लीलासे यदि उसको चलाना । तब वैराग्यका नित्य-नूतन ।
करना अभंग बल-साधना । बुद्धिको पार्थ ॥ ५५ ॥
होता वैराग्यका उत्थान । तब त्रिवर्ग है जान ।
मानो श्वानका वमन । लगता वह ॥ ५६ ॥
यहां तक है अर्जुन । वस्तु-जातमें संपूर्ण ।
अरुचि उभार मान । वैराग्यका हो ॥ ५७ ॥
फिर देहाहंताका म्यान । उतार करके तत्क्षण ।
प्रत्यग्बुद्धि करमें जान । धरना वह ॥ ५८ ॥
फिर वह विवेक सानपे धरना । 'ब्रह्म हूं' यह बोध तीव्र करना ।
फिर उसी एक बोधसे है घिसना । पूर्ण रूपसे ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९२