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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 669

निकलते ही मंदराचल । हुवा क्षीर-सागर निश्चल ।
उसमें कामोर्मियोंका उबाल । नहीं होता ॥ २ ॥
षोडश कलायुत चंद्र-पूर्ण । न दीखे किसी ओरसे अपूर्ण ।
वैसे अपेक्षाका न्यून उत्पन्न । न होता उसमें ॥ ३ ॥
निरूपका कैसे करूं वर्णन । आंधीमें नहीं टिकता रजकण ।
वैसे नहीं आते विषय अर्जुन । उसके सम्मुख ॥ ४ ॥
एवं जिन्होंने किये ऐसे । यज्ञ ज्ञानाख्य हुताशसे ।
यहां वे मिलते हैं वैसे । मानो स्वर्णमें स्वर्ण ॥ ५ ॥
मेरा वह परम पद—
वहां कहा तो कहां । पूछेगा यदि यहां ।
न पहुंचता जहां । नाशका नाम ॥ ६ ॥
दृश्यत्वसे जो देखा जाता । या ज्ञेयत्वसे जाना जाता ।
अमुक ऐसे कहा जाता । ऐसा नहीं जो ॥ ७ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
किंतु जो दीपके प्रकाशसे । या चन्द्राग्निके प्रकाशनेसे ।
अधिक क्या कहूं मैं इससे । न प्रकाशता सूर्यसे भी ॥ ८ ॥
ऐसे प्रकाशसे जो दीखता । उससे वह नहीं दीखता ।
जिससे विश्व दर्शित होता । उससे वह लोप ॥ ९ ॥
खोता जब शुक्तिापन । भासता रजतपन ।
या लोपसे सर्पपन । दीखता डोरा ॥ ३१० ॥
श्रेष्ठ जो चंद्र-सूर्यादिक । बडे हैं प्रकाश दायक ।
उसके अंधारमें देख । प्रकाशते हैं ॥ ११ ॥
प्रकाशता नहीं सूर्य उसको अग्नि चंद्र भी ।
न लौटता वहां जाके मेरा उत्तम धाम जो ॥ ६ ॥
५९७ पुरुषोत्तमयोग