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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 672

सारा ही आकाश निगलकर । व्याप्त होता ब्रह्मांड भास्कर ।
तब कहां प्रति-बिंब और । कहां रश्मि-जाल ॥ ३६ ॥
अथवा कल्पांतमें भरा नीर । उसमें कैसे ओघ धनुर्धर ।
कैसे होंगे मुझमें अविकार । अंशादि तब ॥ ३७ ॥
किंतु जैसे ओघके कारण । ऋजु नीर दीखे वक्र बन ।
रविको भिन्न पन अर्जुन । आता नीरमें ॥ ३८ ॥
गगन वर्तुल या चौकोर । कैसे मिलेगा पांडुकुमार ।
घट मठसे घिर आकार । दीखेगा वैसे ॥ ३९ ॥
अजी ! निद्राका ले आधार । स्वप्नमें राजा बनकर ।
अकेलेसे ही जग भर । होता राज्य ॥ ४० ॥
या मिलनेसे कस हीन । शुध्द स्वर्ण जैसे अर्जुन ।
कसमें उतरता निम्न । वैसे मैं स्वमायामें ॥ ४१ ॥
उससे फैलता है अज्ञान । कोऽहं भावका उठता प्रश्न ।
विचारके कहता मन । मैं देह हूं ऐसे ॥ ४२ ॥
ममैकांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७ ॥
शरीर है जितना आत्मज्ञान भी है अपना—
ऐसे शरीर है जितना । आत्म-ज्ञान भी आपना ।
जिससे है अनुभवना । मेरा अल्पांश ॥ ४३ ॥
वायु संयोगसे है सागर । उमडता ले तरंगाकार ।
वह समुद्रांश धनुर्धर । दीखता अल्प ॥ ४४ ॥
वैसे जडको चेतना देता । देहाहंता प्रकट करता ।
मैं जीव हूं ऐसा भास होता । जीव लोकका ॥ ४५ ॥
जगमें अंश मेरा ही हुआ जीव सनातन ।
खींचता है प्रकृतीसे मन औ' पांच इंद्रियां ॥ ७ ॥
ज्ञानेश्वरी ६००