सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 654

जैसे वर्ष पर वर्ष बीतता । एक दूसरेका मूल बनता ।
वैसे दिवस आता और जाता । जानते नहीं ॥ १३० ॥
जैसे वायुकी लहर आना । उसका जोड़ नहीं समझना ।
वैसे डालोंका झड़ना बढ़ना । समझता नहीं ॥ ३१ ॥
गिरता जब एक देहांकुर । फूटते सहस्र शरीरांकुर ।
तब दीखता भव तरुवर । अव्यय ऐसा ॥ ३२ ॥
पानी बहता जब तीव्र गतिसे । वैसे ही आता है अधिक पीछेसे ।
तभी उस स्रोतको अनंत ऐसे । मानते लोग ॥ ३३ ॥
या जितनेमें पलक झपकती । करोड़ों लहरें उठ गिरती ।
जिससे है दृष्टि अनुभवती । तरंग है नित्य ॥ ३४ ॥
या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर ।
जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ३५ ॥
लट्टू घूमता है तीव्र गतिसे । लगता है चिपक बैठा भूमिसे ।
इसका वेगातिशय होता वैसे । भ्रमका कारण ॥ ३६ ॥
अंधारमें अति वेगसे । अग्नि-काष्ठको घुमानेसे ।
सहज ही दीखता जैसे । चक्राकार ॥ ३७ ॥
यह संसार-वृक्ष ऐसा । नासता बढता सहसा ।
न देख लोक पागल-सा । मानता अव्यय ॥ ३८ ॥
किंतु जो इसका वेग देखता । इसके क्षणिकत्वको देखता ।
करोड़ों बार यह होता जाता । क्षण भरमें जो ॥ ३९ ॥
अज्ञानके बिन नहीं मूल । इसका अस्तित्व नकल ।
यह वृक्ष अति क्षीण-छाल । देखा जिसने ॥ १४० ॥
उसे मानता मैं सर्वज्ञ । वह है वंदनीय प्राज्ञ ।
ब्रह्म-सिद्धांतका है सूज्ञ । धनुर्धर ॥ ४१ ॥
योग-मात्र जो सकल । मिला है उसको ही फल ।
उसके बलसे केवल । जीता ज्ञान ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८२