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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 656

स्त्री पुरुष नपुंसक । आकारसे भेदात्मक ।
टकराते हैं आंगिक । विकार भारसे ॥ ५१ ॥
वर्षाकाल है जैसे गगनमें । फैलता नव मेघके रूपमें ।
वैसे आकार-मात्र अज्ञानमें । फैलता जाता ॥ ५२ ॥
शाखाओंका है फिर अंगभार । झुकके उलझता परस्पर ।
और-गुण क्षोभका है समीर । छूटता तब ॥ ५३ ॥
ऊर्ध्वमूलका फट जाना—
आता है तब भयंकर । गुण क्षोभका बवंडर ।
जिससे तीन स्थान पर । फटता ऊर्ध्वमूल ॥ ५४ ॥
जब ऐसा रजका समीर । बहता है जब धनुर्धर ।
मनुष्य जाति शाखा अपार । बढती हैं ॥ ५५ ॥
न ऊर्ध्व या अधमें उसके । मध्यमें लगती हैं तनेके ।
टेडी शाख फूटते उसके । वर्णकी चार ॥ ५६ ॥
विधि-निषेधके सपल्लव । वेद-वाक्यके जो अभिनव ।
डुलकर उसके पल्लव । करते शोभा ॥ ५७ ॥
ऐहिक भोगके नामवंत । अर्थ-काम कर प्रसारित ।
बढ़ते हैं तीव्र विकसित । नव अंकुरोंसे ॥ ५८ ॥
संसारका जो वृद्धि लोभ । खडा करता शुभाशुभ ।
अनेकानेक कर्म-स्तंब । न जाने कितने ॥ ५९ ॥
पहलेका भोग-क्षय जब होता । साथ ही शुष्क देह जब गिरता ।
तथा विस्तारका प्रारंभ होता । नव देहका तब ॥ १६० ॥
तथा सुशोभित शब्दादिक । सहज रंगके आकर्षक ।
फूटते नित नये मोहक । विषय पल्लव ॥ ६१ ॥
वैसे रजो-वातसे प्रचंड । मनुष्य शाखाओंके झुंड ।
बढते, कहते जिसे रूढ । मानव लोक ॥ ६२ ॥
ज्ञानेश्वरी ५८४