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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन ।
फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥
ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक ।
शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है—
किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता ।
जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥
अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख ।
बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥
वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर ।
जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥
अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर ।
अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥
जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति ।
या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥
अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन ।
अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय ।
शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥
जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके ।
वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०२

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार ।
करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥
जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति ।
फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥
किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन ।
जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥
आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया ।
या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥
वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना ।
देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है—
किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन ।
या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥
श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन ।
आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥
तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो ।
न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥
यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे ।
चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥
६०३ पुरुषोत्तमयोग

वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ ।
उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥
भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख ।
वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥
जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता ।
किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥
या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन ।
भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥
या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान ।
आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥
शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका ।
या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥
वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण ।
करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥
आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म ।
जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥
ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन ।
मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥
वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर ।
देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥
जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन ।
किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥
गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान ।
वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥
कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल ।
चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०४

या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता ।
वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥
घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये ।
आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥
वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता ।
अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥
चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता ।
ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥
तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन ।
सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥
किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति ।
होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥
मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान ।
इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥
करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन ।
करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥
आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर ।
समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥
वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण ।
इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥
मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं—
एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त ।
कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥
६०५ पुरुषोत्तमयोग

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन ।
प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥
जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता ।
चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥
तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि ।
हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें ।
नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥
तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार ।
पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥
गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत ।
भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥
वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार ।
सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥
इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल ।
तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥
सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं—
ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन ।
जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥
सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता ।
चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥
धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना ।
पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०६

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार ।
जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥
धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन ।
पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥
शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध ।
किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥
ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन ।
औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥
कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा ।
विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥
संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? -
किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन ।
तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥
अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे ।
किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥
यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय !
अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥
मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥
जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक ।
भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥
वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा ।
पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥
५०७ पुरुषोत्तमयोग

या एक सूर्य जैसे अर्जुन । लोक चेष्टासे होकर भिन्न ।
उपयोग होता अनुदिन । देखता है तू ॥ १७ ॥
नाना बीज धर्मानुरूप । वृक्ष-रस बनता आप ।
वैसे बदलता स्वरूप । जीवमें मेरा ॥ १८ ॥
जैसे नीलमणिका हार । सर्पत्व लेता भयंकर ।
सुखद होता निरंतर । जब दूसरेको ॥ १९ ॥
अथवा जैसे स्वातीका उदक । सीपमें मोति औ, व्यालमें विष ।
वैसे सु ज्ञानियोंको मैं हूं सुख । दुख अज्ञानियोंको ॥ ४२० ॥
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
सबके हृदयमें जो आत्म-स्फुरण है वह मैं हूं—
वैसे ही होती हृदय मध्यमें । अमुक हूं ऐसी उर्मी सभमें ।
वह स्फुरण जो दिन रातमें । होता मैं हूँ ॥ २१ ॥
किंतु संत संगमें होता । या योग-ज्ञानमें बैठता ।
गुरु-चरण उपासता । वैराग्यसे ॥ २२ ॥
ऐसे ही सत्कर्ममें नित । अज्ञान नष्ट होता पार्थ ।
उसका होता अहं स्थित । आत्म-रूपमें ॥ २३ ॥
वे अपने आपको देख । पाते मुझ आत्मामें सुख ।
मेरे बिन भिन्न न देख । कभी कहीं ॥ २४ ॥
सर्वान्तरोंमें करता निवास
देता स्मृति ज्ञान विवेक मैं ही ।
मैं ही अकेला चिर वेद-वेद्य
वेदज्ञ मैं वेद रहस्य कर्ता ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०८

अजी ! होता है जब सूर्योदय । देखता जैसे सूर्यको ही सूर्य ।
वैसे मेरे ज्ञानका धनंजय । कारण मैं ही ॥ २५ ॥
सबके अज्ञानका कारण भी मैं—
या शरीर सेवामें हो तत्पर । संसार गौरवको सुनकर ।
अहंकार देहमें डूबकर । रहा है जिनका ॥ २६ ॥
वे हैं स्वर्ग संसारार्थ । दौड़ते कर्ममें पार्थ ।
तथा होते हैं दुःखार्थ । मेरे ही कारण ॥ २७ ॥
यह होता भी है अर्जुन । मेरे कारण है अज्ञान ।
जागृत ही देखता स्वप्न । या निद्रा लेता ॥ २८ ॥
जिन बादलोंने सूर्यको छिपाया । उसी सूर्यसे बादल देखा गया ।
मेरे अज्ञानसे वैसे देख लिया । विषय जीवोंने ॥ २९ ॥
जैसे निद्रा या जागृतिका । प्रबोध कारण मूलका ।
वैसे ज्ञानाज्ञान जीवोंका । कारण मैं हूं ॥ ४३० ॥
जैसे सर्पत्वका कारण डोर । वह डोर ही मूल धनुर्धर ।
वैसे ज्ञानाज्ञानका व्यवहार । मुझसे होता ॥ ३१ ॥
तभी मैं. जैसे हूं वैसे । मुझको न जाननेसे ।
वेदके न जाननेसे । उसकी हुई शाखाएं ॥ ३२ ॥
तो भी वेदोंके शाखा-भेदसे । मैं ही एक जाना जाता वैसे ।
सभी ओरकी नदियां जैसे । मिलती सिंधुमें ॥ ३३ ॥
वैसे महा-सिद्धांतके पास पार्थ । श्रुतियां खो जाती हैं शब्द सहित ।
अथवा आकाशमें गंध सहित । वायु-लहरियां ॥ ३४ ॥
वैसे हैं समस्त श्रुतिजात । होते लजाकर जैसे शांत ।
उसका मैं करता यथार्थ । अर्थ प्रकट ॥ ३५ ॥
फिर श्रुति सह जो अशेष । विश्व खो जाता यहां निःशेष ।
वह निज ज्ञान भी विशेष । जानता मैं ही ॥ ३६ ॥
६०९ पुरुषोत्तमयोग
(77)

जैसे निद्रितको कर जागृत । तब न जानता स्वप्नका द्वैत ।
किंतु करना एकत्व प्रतीत । अपना ही जो ॥ ३७ ॥
वैसे अपना अद्वयपन । जानता हूं मैं द्वैतके बिन ।
उसका भी हूं बोध कारण । जाननेका मैं ही ॥ ३८ ॥
आगसे मिला कपूर । न राख न वैश्वानर ।
न रखता धनुर्धर । उसी भांति ॥ ३९ ॥
वैसे समूल अविद्या खाता । वह ज्ञान भी जो डूब जाता ।
जब नहीं ऐसा न रहता । तब है भी कैसे ॥ ४४०॥
मार्ग सह विश्व ले गया जो अर्जुन । उस चोरको पकड़ेगा कैसे कौन ।
ऐसी व्यवस्था है जो विशुद्ध तू जान । वह मैं हूँ ॥ ४१ ॥
ऐसी जो जड़ाजड़ व्याप्ति । कहता है कैवल्यपति ।
अपने रूपकी पूर्ति । निरुपाधिक मैं ॥ ४२ ॥
वह बोध है ऐसा संपूर्ण । बिंबित हुवा पार्थमें जान ।
नभके पूर्ण-चंद्रसमान । क्षीरार्णवमें ॥ ४३ ॥
या जैसे दर्पणमें बिंबत होता । उसके सम्मुख जो चित्र रहता ।
वैसे कृष्ण औ' पार्थ अनुभावता । एक ही बोध ॥ ४४ ॥
फिर भी है वह वस्तु-स्वभाव । बढ़ता जाता प्रिय अनुभव ।
तभी वह अनुभवका राव । कहता अर्जुन ॥ ४५ ॥
कहनेमें अब व्यापकत्व । कहगया निरुपाधिकत्व ।
प्रसंगवश स्वस्वरूपत्व । कहनेमें देव ॥ ४६ ॥
कहना वह एक बार । पूर्णरूपसे कृपाकर ।
श्रीकृष्ण यह सुनकर । कहता भला ॥ ४७ ॥
हमको भी पांडुसुता । इसको कहना भाता ।
किंतु ऐसा प्रश्न कर्ता । मिलता नहीं ॥ ४८ ॥
आज मनोरथका फल । मिला है तू यहां केवल ।
खुलकर यह सकल । पूछनेको ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१०

द्वैत-गुरु-शिष्यसंवाद-से अद्वैतके पारका अनुभव—
अद्वैतके पारका जो भोगना । वह भोग-सुख अनुभवना ।
पूछ कर देता है तू अर्जुन । मुझको मेरा ॥ ४५० ॥
सम्मुख होता है जब दर्पण । आप करता अपना दर्शन ।
वैसे शुद्ध संवादमें अर्जुन । शिरोमणि है तू ॥ ५१ ॥
तेरा अजानसे पूछना । हमको कहते बैठना ।
ऐसा नहीं इसे जानना । सखा मेरे ॥ ५२ ॥
ऐसा कह दिया आलिंगन । कृपा-दृष्टिसे अवलोकन ।
फिर किया हरिने कथन । अर्जुनसे क्या ॥ ५३ ॥
जैसे दो होंठोंसे एक बोलना । दो ही चरणसे एक चलना ।
वैसे दोनोंका पूछना कहना । तेरा मेरा ॥ ५४ ॥
ऐसे हम तुम यहां । देखना एक ही जहां ।
पूछना कहना यहां । दोनों एक ॥ ५५ ॥
लुब्ध हुये देव मोहसे । अर्जुनके आलिंगनसे ।
फिर कहते संकोचसे । यह नहीं उचित ॥ ५६ ॥
इक्षुदंड रसकी भेली । नासती लवणसे भली ।
संवाद-सुख क्रीडा भली । नासेगी जैसे ॥ ५७ ॥
अजी पहलेसे हममें नहीं । नर-नारायणमें द्वैत कहीं ।
लीन हो अब मेरा मुझमें ही । यह आयेगा ॥ ५८ ॥
इस सोचसे अकस्मात । श्रीकृष्ण कहता है पार्थ ।
तूने प्रश्न किया उचित । वह कैसा ॥ ५९ ॥
अर्जुन या कृष्णमें लीन । लौट कर आया वह सुन ।
अपना ही किया हुवा प्रश्न । अब सम्मुख ॥ ४६० ॥
यहां गद्गद हो बोलता । अर्जुन जी ! जी ! कहता ।
निरुपाधिक जो होता । अपना कह ॥ ६१ ॥
६११ पुरुषोत्तमयोग

शार्गधर सुन बोला तब । वही कहने लिये अब ।
कहने लगा जो दोनों भाग । अपनी उपाधिके ॥ ६२ ॥
भगवानकी उपाधिकता—
पूछा था निरुपाधिक । कहता है उपाधिक ।
ऐसा प्रश्न स्वाभाविक । उठेगा यहां ॥ ६३ ॥
अजी ! छासको अलग करना । कहा जाता मक्खन निकालना ।
हीन कस धातु सब जलना । स्वर्ण-शुद्धि ॥ ६४ ॥
या काईको दूर करना । विशुध्द जलको पा लेना ।
तथा बादलोंका हटना । आकाश शुध्द ॥ ६५ ॥
ऊपरसे ढका चोकर । फटकके किया तो दूर ।
शुध्द अनाजका स्वीकार । होता आप ॥ ६६ ॥
वैसे उपाधि उपाहित । विचारनेसे व्यवस्थित ।
किसीसे न पूछते ज्ञात । होता निरुपाधिक ॥ ६७ ॥
जिस भांति मौन रहकर । बाला प्यारसे सकुचाकर ।
पति नाम शब्द मारकर । कहती वैसे ॥ ६८ ॥
जो है न कहने जैसा । कहना पडा है ऐसा ।
तभी उपाधिसे वैसा । कहता श्रीहरी ॥ ६९ ॥
प्रतिपदाकी चंद्ररेखा । दिखाना हो तो वृक्ष-शाखा ।
दिखाते वैसे उपाधिका । करते वर्णन ॥ ४७० ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
पुरुष लोकमें है दो क्षर तथैव अक्षर ।
क्षर हैं सब ये भूत अक्षर स्थिर है वह ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१२

क्षराक्षर पुरुष विचार—
श्री कृष्णने फिर बात की । इस संसार नगरकी ।
बसति है दो पुरुषोंकी । केवल मात्र ॥ ७१ ॥
गगनमें जैसे संपूर्ण । बसते हैं रात औ, दिन ।
संसार नगरमें मान । वैसे ये दो हैं ॥ ७२ ॥
तीसरा भी एक पुरुष रहता । वह इनका नाम नहीं सहता
गांव सह वह इन्हे निगलता । होता जब प्रकट ॥ ७३ ॥
रहने दो तीसरेकी वार्ता । सुनो अब इन दोकी कथा ।
इस संसार ग्राममें पार्था । बसने आये जो ॥ ७४ ॥
एक है अंधा पगला लूला । दूजा सर्वांग पूर्ण है भला ।
ग्राम-गुणोंसे संग केवल । हुवा उनका ॥ ७५ ॥
उनमें है एक क्षर । दूसरा जो है अक्षर ।
दोनोंसे यह संसार । भरा है ठसाठस ॥ ७६ ॥
सुन अब क्षर है कौन । अक्षरका क्या लक्षण ।
अभिप्राय यह संपूर्ण । कहूंगा तुझको ॥ ७७ ॥
जहां है महदकार । वहांसे हे धनुर्धर ।
यहां है जो तृणांकुर । वहां तक ॥ ७८ ॥
जो है बड़ा या थोर । चलता या है स्थिर ।
या जो होता गोचर । मन-बुद्धिसे ॥ ७९ ॥
जो कुछ पंच-भूतसे बनता । नाम-रूपमें आकर फंसता ।
तथा टकसालसे निकलता । गुणत्रयोंकी ॥ ४८० ॥
शिक्का जो है भूताकृतिका । बनाया जाता जो स्वर्णका ।
बनता है वह कालका । द्यूत-बीज ॥ ८१ ॥
जानना ही जो विपरीत । तथा जो कुछ होता ज्ञान ।
वह प्रति-क्षण समाप्त । होता बनके ॥ ८२ ॥
६१३ पुरुषोत्तमयोग

निकाल कर भ्रांतिका नग । खड़ा किया है सृष्टिका अंग ।
पहचाना जाता है जो जग । इस नामसे ॥ ८३ ॥
जो अष्टधा भिन्न ऐसे । दिखाया सातमें जैसे ।
क्षेत्र-द्वारा छत्तीससे । दिखाया है जो ॥ ८४ ॥
पिछला कहना कितना । इसीमें कहा है अर्जुन ।
वृक्षाकार रूप कारण । प्रस्तुत यहां ॥ ८५ ॥
यह सब है जो साकार । देह-कल्पनासे नगर ।
बन गया तदनुसार । चैतन्य आप ॥ ८६ ॥
जैसे कूपमें बन आप ही बिंब । सिंह करता प्रतिबिंबसे क्षोभ ।
फिर उसी क्षेत्रसे है समारंभ । करता कूदनेका ॥ ८७ ॥
या सलिलमें पूर्वका जो होता । व्योम पर व्योम प्रतिबिंबित ।
वैसे अद्वैत होकर भोगता । द्वैत आप ॥ ८८ ॥
अर्जुन ! जो इस प्रकार । पुर कल्पनासे साकार ।
करता आत्मा निद्रा घोर । विस्मृतिकी वहां ॥ ८९ ॥
स्वप्नमें शय्या देख जैसे । स्वप्नमें सो जाते हैं वैसे ।
नगरमें शयन ऐसे । होता आत्माका ॥ ४९० ॥
फिर वह निद्रा मदमें । सुखी या दुखी माननेमें ।
अहंकारकी समाधिमें । बकता जाता ॥ ९१ ॥
यह जनक या यह माता । यह पुत्र वित्त तथा कांता ।
मैं काला गोरा हीन या शास्ता । मेरा है यह सब ॥ ९२ ॥
ऐसे स्वप्नाश्व पर हो सवार । दौड़ता जो स्वर्ग और संसार ।
उस जीवका नाम धनुर्धर । है क्षर पुरुष ॥ ९३ ॥
अब तू सुन यह पार्थ । क्षेत्रज्ञ है जो कहलाता ।
या जिसको जीव कहता । सारा विश्व ॥ ९४ ॥
अपना रूप जो भूल जाता । सर्व-भूतत्व अनुसरता ।
वह चैतन्य है कहलाता । क्षर पुरुष ॥ ९५ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१४

वहां है आत्म-रूपसे पूर्णता । इसीलिये है पुरुषता ।
फिर वह देह-पुरमें सोता । पुरुष-नाम ॥ ९६ ॥
तथा क्षरत्वका जो व्यर्थ । उसपे आक्षेप है पार्थ ।
यह है उपाधि-ग्रथित । इसीलिये ॥ ९७ ॥
बहते पानीके साथ जैसे । चंद्रबिंब उछळता वैसे ।
उपाधिके विकारमें ऐसे । दीखता वह ॥ ९८ ॥
या बहता पानी जब सूखता । बिंबित चंद्रमा भी है लोपता ।
वैसे उपाधि-नाशमें लोपता । उपाधि-धारी ॥ ९९ ॥
ऐसे उपाधिके ही कारण । क्षणिकत्व जुडता है जान ।
उपाधि नाशके ही कारण । क्षर यह नाम ॥ ५०० ॥
ऐसे जीव चैतन्य संपूर्ण । है यह क्षर-पुरुष जान ।
अब मैं अक्षरका वर्णन । करूंगा स्पष्ट ॥ १ ॥
अक्षर पुरुषका वर्णन—
अक्षर यह दूसरा । पुरुष है धनुर्धर ।
मध्यस्थ है गिरिवर । मेरु सामान ॥ २ ॥
यह पृथ्वी पाताळ स्वर्गमें । न होता विभाजित तीनोमें ।
वैसे यह ज्ञान अज्ञानमें । पड़ता नहीं ॥ ३ ॥
यहां न यथार्थ ज्ञानमें एकत्व । या विपरीत ज्ञानमें अनेकत्व ।
ऐसे केवळ अज्ञान ही जो तत्व । वही यह रूप ॥ ४ ॥
धूलत्व संपूर्ण मिटता । किंतु घटादि नहीं होता ।
जैसा मृत्तिका पिंड होता । ऐसा मध्यस्थ जो ॥ ५ ॥
सूख जानेपे सागर । नहीं तरंग नहीं नीर ।
ऐसी यह अनाकार - । दशा जान ॥ ६ ॥
जागृति नहीं जहां अर्जुन । तथा प्रारंभ न होता स्वप्न ।
इस भांति तम-घन जान । इसका रूप ॥ ७ ॥
६१५ पुरुषोत्तमयोग

विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित ।
ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥

  • “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं ।
    इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥
    जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित ।
    दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥
    होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा ।
    फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥
    वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त ।
    उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥
    जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव ।
    उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥
    जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न ।
    नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥
    जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व ।
    इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥
    तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें ।
    या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥
    जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति ।
    इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥
    वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता ।
    ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥
    किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो ।
    क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥
  • अजामेकम् श्रुतिवचन—
    ज्ञानेश्वरी ६१६

रहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख ।
उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥
यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता ।
तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥
और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना ।
इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥
तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता ।
तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥
इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार ।
वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥
ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण ।
अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन—
अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी ।
खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥
वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता ।
जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥
ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन ।
जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥
कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम ।
विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥
(78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग

वही है जो उत्तम पुरुष । तीसरा क्यों इसका निष्कर्ष ।
उन दोनोंसे भिन्न है देख । यह अंतिम ॥ २९ ॥
सुषुप्ति और स्वप्न । उससे भिन्न अर्जुन ।
जागृति जैसे जान । बोधकी जो ॥ ५३० ॥
किरण अथवा होता मृगजळ । उससे भिन्न जैसे सूर्य-मंडल ।
वैसे ही भिन्न यह अति बहुल । उत्तम पुरुष ॥ ३१ ॥
जैसे काष्ठमें काष्ठसे भिन्न । भरा रहता अग्नि अर्जुन ।
वैसे क्षर-अक्षरसे भिन्न । रहता है यह ॥ ३२ ॥
अपनी सीमाओंको निगलकर । नदी नदोंको एक करता नीर ।
पूर्णत्वमें उठता एक होकर । कल्पांतका उदधि ॥ ३३ ॥
वैसे स्वप्न या नहीं सुषुप्ति । नहीं रहती वहां जागृति ।
जैसे निगलता दिन-राति । कल्पांतका तेज ॥ ३४ ॥
फिर नहीं एकत्व या द्वैत । है या नहीं जानता है पार्थ ।
प्रतीति लोप हुई हो दीप्त । रहा नहीं कुछ ॥ ३५ ॥
इस प्रकार जो कुछ है । वही उत्तम-पुरुष है ।
इसीको सब कहते हैं । परमात्मा ॥ ३६ ॥
वह भी यहां लय नहीं होके । बोलना जीवत्वमें ही रहके ।
बोलना किनारेमें ही बैठके । डूबे हुएकी बातें ॥ ३७ ॥
वैसे विवेक तट पर । कहते खडा रहकर ।
पैल तीरकी धनुर्धर । बातें वेद ॥ ३८ ॥
तभी पुरुष क्षराक्षर । दोनों देखके इस और ।
इसके कहते हैं पर- । आत्म-रूप ॥ ३९ ॥
यहां है इस प्रकार । परमात्म शब्द पर ।
सुनाते हैं धनुर्धर । पुरुषोत्तम ॥ ५४० ॥
वैसे हे मौनसे ही बोलना । न जाननेसे वहां जानना ।
तथा न होनेसे ही है होना । वह तत्व ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी ६१८

सोऽहम् भाव है अस्त होता । कहनेवाला कोई न होता ।
दृष्टत्व सह जाना है पार्थ । जाना दृश्य भी ॥ ४२ ॥
बिंब तथा है प्रतिबिंबकी । न ले सकते प्रभा बीचकी ।
कहना नहीं प्रभा कहांकी । ऐसे कभी ॥ ४३ ॥
घ्राण तथा पुष्पके मध्य । सुवास रहता है हृद्य ।
आंखोंसे दीखना असाध्य । उसे ना कहना ॥ ४४ ॥
वैसे दृश्यादृश्य दोनों मिटता । फिर क्या है यह कौन कहता ।
इसी अनुभवसे है देखता । वह जो रूप ॥ ४५ ॥
वह है प्रकाश बिन प्रकाश । ईशितव्यके बिना है जो ईश ।
अपनेसे भरता अवकाश । आप ही सारा ॥ ४६ ॥
नादसे जो सुनना नाद । स्वादसे है चखना स्वाद ।
अनुभवना जो आनंद । आनंदसे ही ॥ ४७ ॥
सुख ही जहां सुख पाता । तेजसे है तेज मिलता ।
शून्य भी जहां डूब जाता । महाशून्यमें ॥ ४८ ॥
पूर्णताका जो परिणाम । पुरुष वह सर्वोत्तम ।
विश्रांतिका भी है विश्राम । जहां लेता विश्रांति ॥ ४९ ॥
विकार पर भी जो रहता । ग्रासको ग्रासकर पूर्णता ।
बहुतसे जो बहुत होता । बहुत गुना ॥ ५५० ॥
चैतन्य विश्वाकार कैसे दीखता है ?—
जो अज्ञानीके प्रति । रजतकी प्रतीति ।
चांदी न होके शुक्ति । करती जैसे ॥ ५१ ॥
अथवा जो अलंकार रूपमें । न छिपके सोना छिपता उसमें ।
विश्व न होकर भी वैसे विश्वमें । वह है विश्वाधार ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जल तरंग । पानीसे रहता है अभंग ।
वैसे प्रतीत करता जग । वह है प्रकाश ॥ ५३ ॥
६१९ पुरुषोत्तमयोग

अपने संकोच विकास । आप ही कारण वीरेश ।
जलमें चन्द्र होता जैसा । स्वयं आप ॥ ५४ ॥
वैसे विश्वात्ममें जो कुछ होता । विश्व-लोपसे कहीं नहीं जाता ।
जैसे रात दिनमें नहीं होता । दो प्रकारका सूर्य ॥ ५५ ॥
वैसे कहीं किसी ओरसे । कम नहीं होता किसीसे ।
सदैव रहता है वैसे । अपना-सा वह ॥ ५६ ॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
पुरुषोत्तमका विवेचन—
अपनेसे ही जो अर्जुन । प्रकाशता आप है जान ।
क्या कहूँ उसके समान । नहीं अन्य ॥ ५७ ॥
वह हूँ मैं निरुपाधिक । क्षराक्षरोत्तम हूँ एक ।
इसीलिये वेद और लोक । कहते पुरुषोत्तम ॥ ५८ ॥
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
ऐसा जो मैं पुरुषोत्तम । जानना मुझे प्रियोत्तम ।
उदय होते ही उत्तम । ज्ञान सूर्य ॥ ५९ ॥
होते ही जागृतिका ज्ञान । मिट जाता है जैसे स्वप्न ।
स्फुरता उसे त्रिभुवन । सारा व्यर्थ ॥ ५६० ॥
मैं क्षराक्षरसे भी जो भिन्न हूं और उत्तम ।
इससे वेद लोगोंने कहा है पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥
हटाके मोहको दूर जाने मैं पुरुषोत्तम ।
मुझको भजते हैं वे सर्वज्ञ सर्व-भावसे ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी ६२०

अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे ।
मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥
अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता ।
उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥
फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द ।
अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥
उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना ।
उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥
इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान ।
गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥
जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन ।
या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥
मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द ।
वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥
अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती ।
इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥
इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर ।
ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥
जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ ।
वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह ।
इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥
६२१ पुरुषोत्तमयोग