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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 667

अहांसे इतना धनुर्धर । होता विश्व-क्रमका विस्तार ।
व्यर्थ अभिष्ठ जिस प्रकार । होता निर्दैवीका ॥ ८१ ॥
कैसे वह रूप देखना । अपनेमें आप अपना ।
हिमसे है हिम जमना । हिम-रूपमें ॥ ८२ ॥
और एक जो उसका । लक्षण है जाननेका ।
उससे पुनर्जन्मका । होता है अंत ॥ ८३ ॥
किंतु उससे मिलते जैसे । भरकर सर्वत्र ज्ञानसे ।
महा-प्रलयमें नीर जैसे । भरा रहता है ॥ ८४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥
वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको प्राप्त करते हैं—
जिस पुरुषका मन । छोड़ गये मोह मान ।
वर्षांतमें जैसे घन । आकाशको ॥ ८५ ॥
जो है अकिंचन निष्ठुर । उससे ऊबता है घर ।
वैसे ही उसको विकार । तज जाते हैं ॥ ८६ ॥
उखडता फला हुवा केल । वैसे आत्म-लाभसे प्रबल ।
क्रिया कलाप होते उन्मूल । अपने आप ॥ ८७ ॥
वृक्ष है जब जलता । पक्षी-गण उड़ जाता ।
वैसे उसको तजता । विकल्प सारा ॥ ८८ ॥
जो मान मोहासह संग-दोष
उखाड निष्काम अध्यात्म निष्ठ ।
निर्द्वन्द्व जो हो सुख दुःख मुक्त
वे प्राज्ञ पाते वह नित्य धाम ॥ ५ ॥
५९५ पुरुषोत्तमयोग