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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 668

जैसे सकल दोष ऋण । अंकुरती पृथ्वी अर्जुन ।
उस भेद बुद्धिका भान । नहीं होता उसे ॥ ८९ ॥
जब सूर्यका उदय होता । रातका अस्तित्व न रहता।
वैसे देहाहंकार भागता । अविद्या सह ॥ २९० ॥
जैसे जीवको आयुष्य हीन । छोडता शरीर उसी क्षण ।
वैसे तजता द्वैत अर्जुन । उस पुरुषको ॥ ९१ ॥
पारसको लोहेका अकाल होता । रविसे कभी अंधार न मिलता ।
द्वैत-बुद्धिका दर्शन नहीं होता । उसको कभी ॥ ९२ ॥
अजी ! सुख दुःखका आकार । द्वंद्व होते देहमें गोचर ।
उसके सन्मुख धनुर्धर । नहीं होते कभी ॥ ९३ ॥
स्वप्नका राज्य या मरण । हर्ष या शोकका कारण ।
न होता जागृतिमें जान । उसी भांति ॥ ९४ ॥
वैसे सुख दुःख रूप । द्वंद्व जो पुण्य औ' पाप ।
न घेरते उसे साप । गरुड़को जैसे ॥ ९५ ॥
तथा अनात्म-वर्ग नीर । छोड़ आत्म-रसका क्षीर ।
करता है जो स-विचार । राज हंस-सा ॥ ९६ ॥
वर्षा कर जैसे पृथ्वीपर । अपने ही रसको भास्कर ।
खींचता रश्मियां फैलाकर । अपने ही बिंबमें ॥ ९७ ॥
आत्म-भ्रांतिके लिये ही वैसे । बिखुरे वस्तु सभी ओरसे ।
एकत्र किये ज्ञान दृष्टिसे । अखंड जो ॥ ९८ ॥
तथा निर्णयमें आत्माका । विवेक डूबता उनका ।
प्रवाह डूबता गंगाका । सिंधुमें जैसे ॥ ९९ ॥
या होनेसे आप संपूर्ण । न रहा आशाका कारण ।
न करता इच्छा गगन । परे जानेकी ॥ ३०० ॥
जैसे हैं अग्निका डोंगर । न लेता बीज अंकुर ।
उसके मनमें विकार । न आते वैसे ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ५९६