सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 657

वैसे रजका समीर । रुकते ही बहता घोर ।
तमोगुणका बवंडर । उसी समय ॥ ६३ ॥
तभी यही मनुष्य शाख । नीचे नीचे वासना देख ।
फैलती है शाखोपशाख । कुकर्मकी जो ॥ ६४ ॥
अप्रवृत्तिसे जो चिन्हित । निकलते डंटल पार्थ ।
उसमें लगते हैं सार्थ । प्रमादके ॥ ६५ ॥
बोलते निषेध-नियम । मंत्र जो हैं ऋक्-यजु-साम ।
गाते वही पात अकर्म । सम्मुख आके ॥ ६६ ॥
प्रतिपादन अभिचार । मंत्र-तंत्र जो पर-भार ।
करते उसका प्रसार । वासना लता ॥ ६७ ॥
तब तब होते बलिष्ठ । अकर्मादि जड़ अनिष्ट ।
तथा बढ़ते शाख पुष्ट । जन्मकी आगे ॥ ६८ ॥
चांडालादि वहां निकृष्ट । दोष-योनिके दंड पुष्ट ।
फैलाता जन कर्म-भ्रष्ट । जाल भ्रमका ॥ ६९ ॥
उसे पशु-पक्षी सूकर । व्याघ्र वृश्चिकादि विषार ।
टेडे शाखाओंका विस्तार । होता है जैसे ॥ १७० ॥
ऐसी जो शाखायें पांडव । सर्वांगमें नित्य ही नव नव ।
देती हैं नरकानुभव । फलका तो ॥ ७१ ॥
हिंसा रति वहां प्रमुख । कुकर्म-संघ ही है सुख ।
निषिद्ध कर्मांकुर चोख । बढ़ते जन्मोंसे ॥ ७२ ॥
ऐसे होते हैं तरु-तृण । लोह लोष्ट औ' पाषाण ।
इस शाखके ऐसे जान । लगते फल ॥ ७३ ॥
अर्जुन ! यह तू सुन । मनुष्यसे जो है निम्न ।
वृद्धि स्थिर तक जान । शाखाओंकी ॥ ७४ ॥
तभी मनुष्य-रूपी डाल । तलेकी शाखाओंका मूल ।
आगे फैलता वही मूल । संसार-तरुका ॥ ७५ ॥
(74) ५८५ पुरुषोत्तमयोग