ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में सटीक लिप्यंतरण है:
तथा वह सर्वत्र समस्त । स्थानमें होता है प्राप्त ।
सभी रूपमें पूर्ण-दर्शित । सो विश्वतःपाद ॥ ७५ ॥
सविताको जैसे नहीं नयन । अवयव में दीखते हैं भिन्न ।
किंतु करता सबका दर्शन । वह स्वरूप ॥ ७६ ॥
इसीलिये वह विश्वतचक्षु । वास्तवमें होकर जो अचक्षु ।
कहलाता बोलनेमें जो वृक्ष । वेदसे भी ॥ ७७ ॥
जो है सबके शिर पर । रहता है नित्य तत्पर ।
आत्म-सत्तासे होके स्थिर । तभी है विश्वमूर्ध्ने ॥ ७८ ॥
जैसे संपूर्ण मूर्ति ही मुख । हुताशनका वैसे है देख ।
वैसे है सर्व-मुखसे अशेष । है वह भोक्ता ॥ ७९ ॥
इसीलिये सुन पार्थ । विश्वतोमुख व्यवस्था ।
चली आयी है वाक्प्रथा । श्रुतिसे ही ॥ ८८० ॥
वस्तु-मात्रमें गगन । जैसे रहता संलग्न ।
वैसे शब्दमें हैं कान । जिसको सर्वत्र ॥ ८१ ॥
इसीलिये हम जिसे । सभी सुनता है वैसे ।
कहते हैं सदा जिसे । विश्व-व्यापक ॥ ८२ ॥
वैसे तो सुन महामती । विश्वतः चक्षु आदि श्रुति ।
दिखाती है उसकी व्याप्ति । मूर्तिरूपसे ॥ ८३ ॥
इसीलिये नेत्र-पाद-हस्त । सभी भाषा है व्यर्थ ।
तथा शून्य भी अयुक्त पार्थ । 'वर्णनमें यहां ॥ ८४ ॥
कल्लोल निगलता कल्लोल । यही देखते हम सकल ।
ग्रासता ग्राससे जो सलिल । भिन्न है क्या ॥ ८५ ॥
वैसे सत्य ही जो एक । जो है व्याप्त औ' व्यापक ।
किंतु भाषा-हेतु देख । होता है भेद ॥ ८६ ॥
होता है जब शून्य दिखाना । पडता है बिंदु ही लिखना ।
वैसे जब अद्वैत कहना । द्वैतकी भाषामें ॥ ८७ ॥
५०३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
नहीं तो सुन पार्थ । गुरु-शिष्य सत्पथ ।
टूट जाता सर्वथा । शब्द ही रुकेगा ॥ ८८ ॥
इसी कारणसे श्रुति । द्वैत भावसे करती ।
स्पष्ट अद्वैतकी स्थिति । परंपरासे ॥ ८९ ॥
सुन तू वही अब धनुर्धर । यहां जो नेत्र-गोचर आकार ।
वह सब ज्ञेय इस प्रकार । विश्व-व्यापक है ॥ ८९० ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥
ब्रह्मदर्शनकी कृतार्थता—
अर्जुन वह व्याप्त है ऐसे । अवकाशको आकाश जैसे ।
वस्त्र रूपसे हैं तंतु जैसे । होते हैं व्याप्त ॥ ९१ ॥
उदकमें जैसे रसत्व । दीपमें जैसे प्रकाशत्व ।
वैसे व्याप्त है वह तत्व । सदा सर्वत्र ॥ ९२ ॥
कर्पूरत्वसे कर्पूरमें जैसे सौरभ । सौरभ भरा रहता है वैसे ।
कर्म-रूपसे शरीरमें वैसे । बसता शरीर ॥ ९३ ॥
अथवा जैसे है अर्जुन । स्वर्णमें व्यापता है सुवर्ण ।
वैसे ही सर्वांग-संपूर्ण । बसता है वह ॥ ९४ ॥
कण रूपमें रहता सुवर्ण । कहते तब सुवर्णका कण ।
टूटता है कण-रूप सुवर्ण । स्वर्ण कहते तब ॥ ९५ ॥
प्रवाह जब टेढा बनता । पानी है तब सीधा रहता ।
आगसे लोहा लाल हो जाता । न होता वह अग्नि ॥ ९६
गोल होता जब घटाकार । नभ होता तब गोलाकार ।
होता है जब घर चौकाकार । नभ भी वैसे ही ॥ ९७ ॥
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वह जो इंद्रियातीत उनके कार्य भासते ।
अ-स्पर्शसे धरे सारे अगुण गुण भोगके ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०४
आकाशका नहीं होता आकार । दीखता जैसे वह सर्वाकार ।
अकाशपे नहीं होते विकार । वैसी वह वस्तु ॥ ९८ ॥
मन मुख्य इंद्रियोंसे । तथा सन्त्वादि गुणसे ।
आकार लेता है वैसे । दीखता यहां ॥ ९९ ॥
जैसे मीठेकी जो मिठास । न होती आकारमें खास ।
नहीं होता वह विशेष । गुणोंद्रियोंमें ॥ १०० ॥
अजी ! है दूधकी स्थितिमें । घृत होता उसी रूपमें ।
तथा दूधके अभावमें । घृत ही घृत ॥ १ ॥
यहां है वह विकारसे । विकृत नहीं होता वैसे ।
गहना आकार नामसे । नहीं तो सोना सोनाही ॥ २ ॥
यहां यदि स्पष्ट रूपसे । कहना हो सरलतासे ।
वह है गुण-इंद्रियोंसे । भिन्न तत्व ॥ ३ ॥
नभ-रूपका संबंध । जाति क्रिया आदि भेद ।
यह आकार प्रवाद । तत्वका नहीं ॥ ४ ॥
अजी ! वह कोई भी गुण नहीं । गुणसे उसका संबंध नहीं ।
किंतु गुणोंको उसके तईं । होता भास ॥ ५ ॥
यहां इसी कारणसे । मति संभ्रम होनेसे ।
उसमें विकार ऐसे । देखते हैं ॥ ६ ॥
उन विकारोंका धारण । जैसे बादलोंको गगन ।
या है प्रतिबिंब दर्पण । करते वैसे ॥ ७ ॥
अथवा सूर्य प्रति मंडल । धरता है पृथ्वीपे सलिल ।
या रश्मि-करमें मृगजल । धरता वैसे ॥ ८ ॥
वैसे है संबंधके बिन । सबको धरता निर्गुण ।
किंतु वह है व्यर्थ जान । भ्रांत-दृष्टि ॥ ९ ॥
इस भांति है निर्गुण । भोगता है सब गुण ।
रंकका राज धारण । स्वप्नमें जैसे ॥ ९१० ॥
(64) ५०५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसीलिये गुणका संग । अथवा होना गुण-भोग ।
वह है निर्गुणमें त्याग । नहीं होता ॥ ११ ॥
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥
चराचर भूतोंमें होता । विविध अग्नि पांडुसुत ।
किंतु होती जैसी उष्णता । अभेद रूपसे ॥ १२ ॥
वैसे ही अविनाश भावसे । रहता पूर्ण सूक्ष्म रूपसे ।
व्याप्त होकर जान उसे । यहां तू ज्ञेय ॥ १३ ॥
एक जो बाहर अंदर । वही एक पास औ' दूर ।
उस एकसे धनुर्धर । नहीं अन्य ॥ १४ ॥
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥
क्षीर-सागरमें जैसा । माधुर्य होता एक-सा ।
तटमें मध्यमें वैसा । पूर्ण है जो ॥ १५ ॥
स्वेदज अंडजादिक । भूतोंमें व्याप्त जो एक ।
न होता उसमें देख । कभी न्यून ॥ १६ ॥
जिस प्रकार अनेक घटोंमें । प्रतिबिंब पडते सहस्रोंमें ।
किंतु भिन्नता नहीं चंद्रिकामें । वैसे ही पार्थ ॥ १७ ॥
या नाना लवण-कण राशिमें । क्षारता एक-सी होती सबमें ।
अथवा अनेक इक्षु-दंडमें । मिठास एक-सी ॥ १८ ॥
एक है जो अंतर्बाह्य जो है एक चराचर ।
जो है दूर तथा पास सूक्ष्मत्वसे अगम्य जो ॥ १५ ॥
अभेद भूत-मात्रोंमें रहा है जो विभक्त-सा ।
जन्म दे पालता भूत लीलता अंतमें स्वयं ॥ १६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०६
वैसे अनेक भूत-जात । उस एकसे ही व्याप्त ।
विश्व-कार्यका वही पार्थ । कारण एक ॥ १९ ॥
इसीलिये सब भूताकार । जिसका एक-मात्र आधार ।
जैसे तरंगोंका है सागर । आधार एक ॥ ९२० ॥
बाल्यादि स्थितियोंमें जैसे । शरीर है एक ही वैसे ।
सृष्टि-स्थिति-लयमें वैसे । अखंड है वह ॥ २१ ॥
सायं प्रातः पाध्यान्ह । चलता दिनमान ।
किंतु जैसे गगन । रहे एक-सा ॥ २२ ॥
सृष्टि-वेलामें प्रियोत्तम । कहते हैं जिसको ब्रह्म ।
व्याप्तिमें है जो विष्णु नाम । पडा उसको ही ॥ २३ ॥
मिटता है जब आकार । रुद्र तब प्रलयंकर ।
रहता तब शून्याकार । मिटते गुणत्रय ॥ २४ ॥
निगलकर नभका शून्य । मिटाकर जो गुणको अन्य ।
रहता है शून्य महाशून्य । श्रुति-वचन ऐसा ॥ २५ ॥
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
अग्निका जो दीपन । चंद्रका जो जीवन ।
सूर्यके हैं नयन । देखते जिससे ॥ २६ ॥
सदैव जिसका उजियाला । प्रकाशता तारागण-माला ।
जिससे महा-तेज है खिला । सुखसे सर्वत्र ॥ २७ ॥
जो है आदिका आदि । तथा वृद्धिकी वृद्धि ।
बुद्धिकी भी है बुद्धि । जीवका जीव ॥ २८ ॥
कहाता तेजका तेज तथा तम तमांधका ।
ज्ञानका ज्ञान जो ज्ञेय सबका हृदयस्थ है ॥ १७ ॥
५०७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
मनका है जो मन । नेत्रका है नयन ।
कानका है जो कान । वाचाकी वाचा ॥ २९ ॥
प्राणका है जो प्राण । गतिके है चरण ।
क्रियाका कर्तापन । जिससे है ॥ ९३० ॥
आकारता जिससे आकार । विस्तारता उससे विस्तार ।
संहारता उससे संहार । धनंजय यहां ॥ ३१ ॥
जो है मेदिनीकी मेदिनी । जो पानीको पीकर पानी ।
तेजका प्रकाश-दायिनी । महा-तेजशक्ति ॥ ३२ ॥
वायुका है वह श्वासोच्छ्वास । तथा गगनका अवकाश ।
इन सबका है जो आभास । आभासता जिससे ॥ ३३ ॥
अथवा है यह अर्जुन । सबमें है सर्वस्व पूर्ण ।
वहां नहीं होता दर्शन । द्वैतका कभी ॥ ३४ ॥
होते ही इसका दर्शन । मिटता दृश्य-द्रष्टा पूर्ण ।
हो जाता है जब मिलन । समरस भावसे ॥ ३५ ॥
फिर होता वहीं ज्ञान । ज्ञाता ज्ञेयका दर्शन ।
औ' ज्ञानसे प्राप्ति-स्थान । वह भी यही ॥ ३६ ॥
जैसा समाप्त होते लेख । संख्या सब हो जाती एक ।
वैसे साध्य-साधनादिक । आता एकत्वमें ॥ ३७ ॥
जिस स्थानमें अर्जुन देख । नहीं होता द्वैतका उल्लेख ।
वही होता हृदयमें एक । भूतमात्रके ॥ ३८ ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
कहा है अल्पमें क्षेत्र वैसे ही ज्ञान ज्ञेय भी ।
जानके भक्त है मेरा पाता सायुज्य है मम ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०८
आत्माके एकत्वका विवेचन-आत्मानात्म विचार-
इस प्रकारसे पार्थ । पहिलेसे ही निश्चित ।
स्पष्ट किया क्या है खेत । विवेचनसे ॥ ३९ ॥
वैसे ही क्षेत्र-दर्शन । करने दिये नयन ।
कहते हैं जिसे ज्ञान । कहा वह भी ॥ ४० ॥
वैसे ही अज्ञान लक्षण । किये सविस्तर वर्णन ।
जिसे सुनकर अर्जुन । थका होगा तू ॥ ४१ ॥
तथा स्पष्टतासे पार्थ । कहा देकर दृष्टांत ।
ज्ञेय-स्वरूप निश्चित । समझाके ॥ ४२ ॥
यह जो विवेचन संपूर्ण । करता है हृदय ग्रहण ।
मत्सिद्धि भावना प्राण । करता सहज ॥ ४३ ॥
तब देहादिका परिग्रह । होता है संन्यास निराग्रह ।
तथा प्राण होता निरीह । सेवक मेरा ॥ ४४ ॥
तब वे मैं ही हूं अर्जुन । अंतिम आसरा है जान ।
कर मुझे चित्त अर्पण । होते मद्रूप ॥ ४५ ॥
मद्रूप होनेका पथ । .रचाया सुन तू पार्थ ।
सुलभ और निश्चित । हमने यह ॥ ४६ ॥
चढनेमें जैसे सीढी रचते । अथवा ऊपर मंच बांधते ।
तथा अपनी नांव भी रखते । तैरने पूरमें ॥ ४७ ॥
सब कुछ है यदि यहां आत्मा । ऐसा कहता तो मैं वीरोत्तम ।
ग्रहण न करना मनो-धर्म । यह बात मेरी ॥ ४८ ॥
इसीलिये था जो एकाकार । कर बताये चार प्रकार ।
देखके तेरी पांडुकुमार । मंद बुद्धि ॥ ४९ ॥
शिशुको जब खिलाते । ग्रास बीस कर देते ।
वैसे ही चार कहे ये । हमने एकके ॥ ५० ॥
५०९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
एक क्षेत्र औ' एक ज्ञान । एक ज्ञेय एक अज्ञान ।
भाग किये ये तेरी जान । ग्रहण-शक्ति ॥ ५१ ॥
किंतु इस भांतिसे भी पार्थ । मंतव्य समझमें न आता ।
तब यह दूसरी व्यवस्था । कहता तुझे ॥ ५२ ॥
चार भाग यहां नहीं करूंगा । एक ही तत्व नहीं कहूंगा ।
आत्मानात्म विचार कहूंगा । अब तुझसे ॥ ५३ ॥
किंतु तुझे इतना करना । ध्यान पूर्वक बात सुनना ।
श्रवणोंका है नाम रखना । अपना ही ॥ ५४ ॥
सुनकर कृष्ण वचन पार्थ । प्रसन्न-मन हुवा रोमांचित ।
कृष्ण मानता हुई है अंकित । बात इनपे ॥ ५५ ॥
इससे हुवा भावावेग । समेट कहता श्रीरंग ।
प्रकृति-पुरुष विभाभ । कहता हूं सुन ॥ ५६
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १९ ॥
कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग इसे अर्जुन ।
जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ५७ ॥
सुन तू अब निर्दोष । प्रकृति-पुरुष विवेक ।
कहता है आदि पुरुष । अर्जुनसे वहां ॥ ५८ ॥
प्रकृति प्रेरित कर्मका भोक्ता—
पुरुष अनादि है साथी । उसकी रही है प्रकृति ।
जैसे है दिवस औ' राति । दोनों अनादि ॥ ५९ ॥
रूप नहीं होता व्यर्थ । छाया होती उसके साथ ।
दाने सह भूसा भी पार्थ । बढता जैसे ॥ १६० ॥
प्रकृति-पुरुषकी है जोडी जान अनादि तू ।
होते प्रकृतिके द्वारा विकार गुण है सब ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१०
दोनो रहते हैं वैसे साथ । प्रकृति-पुरुष होते व्यक्त ।
परस्पर चिपके हैं पार्थ । अनादि सिद्ध ॥ ६१ ॥
जिसका नाम क्षेत्र । कहा है एक-मात्र ।
जानता है सर्वत्र । प्रकृति उसे ॥ ६२ ॥
तथा क्षेत्रज्ञ है ऐसे । कहा है जिसको उसे ।
मानता पुरुष उसे । यह है स्पष्ट ॥ ६३ ॥
इनके हैं ये नाम भिन्न । किंतु तत्व एक अर्जुन ।
न भूलना यह लक्षण । यहां कभी ॥ ६४ ॥
रही है यहां जो सत्ता । वही पुरुष है पार्थ ।
प्रकृति नाम समस्त । क्रिया मात्रका ॥ ६५ ॥
बुध्दि-इंद्रिय-अतःकरण । इत्यादि है विकार भरण ।
तथा रहे हैं वे तीनों गुण । सत्व रजादिक ॥ ६६ ॥
इन सबका मिलन । प्रकृतिसे हुवा जान ।
इसीसे होते उमझ । सभी कर्म ॥ ६७ ॥
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ २० ॥
वहां इच्छा बुध्दि सहित । अहंकार सह घाटित ।
उसे चस्का लगाते पार्थ । करणोंका ॥ ६८ ॥
यही कारण करने संपन्न । जिन उपयोंका सूत्र चालन ।
उसको कहते सुन अर्जुन । कार्य है यह ॥ ६९ ॥
तथा इच्छा मदके द्वारा । प्रकृतिने मन उभारा ।
औ' इंद्रियोंका व्यवहार । वह है कर्तृत्व ॥ १७० ॥
कहा प्रकृतिके पास कर्तृत्व देह-इंद्रिका ।
तथा पुरुषके पास भोक्तृत्व सुख दुःखका ॥ २१ ॥
५११ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
सभी यह तीनों जान । कार्य कर्तृत्व कारण ।
प्रकृति मूल श्रीकृष्ण । कहता यहां ॥ ७१ ॥
ऐसे तीनोंके ही समन्वयसे । प्रकृति होती है कर्म-रूपसे ।
फिर जो गुण बढ़ाता है जैसे । लेती है वह रूप ॥ ७२ ॥
सत्व-गुणसे जो बनता । वह सत्कर्म कहलाता ।
रजसे जो है निपजता । वह है मध्यम ॥ ७३ ॥
जिसका आधार है तम । ऐसे होते हैं सब काम ।
कहलाते हैं वे अधम । जान तू यहां ॥ ७४ ॥
ऐसे होते हैं प्रकृतिसे । भले बुरे कर्म जो जैसे ।
उत्पन्न होते हैं उनसे । सुख दुःख ॥ ७५ ॥
असत्कर्मसं दुःख उत्पन्न । सत्कर्मसे है सुख अर्जुन ।
उन दोनोंको कहते जान । भोग पुरुषका ॥ ७६ ॥
सुख दुःख सब जब तक । सच मानते हैं तब तक ।
प्रकृति कर्मरत है देख । औ' पुरुष भोगता ॥ ७७ ॥
प्रकृति पुरुषका संसार । अति असंगत धनुर्धर ।
लाती है भार्या जो कमाकर । खाता है भर्त्ता ॥ ७८ ॥
तथा भर्त्ता भार्या परस्पर । नहीं करते संग संसार ।
और सुनो यह चमत्कार । प्रकृति जनती जग ॥ ७९ ॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
प्रकृतिके गुणोंसे होने वाला भास—
यह भर्त्ता है निराकार । निष्क्रिय निर्गुण है और ।
जरा-जीर्ण है धनुर्धर । वृद्धातिवृध्द ॥ ९८० ॥
बंधा है प्रकृतीसे जो उसके गुण भोगता ।
शुभाशुभ जन्म पाता प्रकृति-संगसे यह ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१२
वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक ।
अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥
वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण ।
जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥
जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता ।
इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥
वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता ।
किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥
उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल ।
दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥
इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब ।
अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥
प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन ।
जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥
यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध ।
होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥
अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक ।
ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥
भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप ।
विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥
यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी ।
इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥
यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार ।
प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥
कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया ।
इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥
५१३
(65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
यह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल ।
अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥
उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात ।
यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥
अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी ।
शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥
उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार ।
अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥
सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार ।
वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥
उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति ।
तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥
उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त ।
उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥
अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण ।
तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥
उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार ।
निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥
उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म ।
स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥
उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण ।
अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥
उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव ।
अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥
इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति ।
विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१४
यहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता ।
अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥
जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण ।
बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥
या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन ।
बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥
या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें ।
तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥
जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन ।
वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥
जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे ।
स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥
वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण ।
जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥
वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता ।
प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥
किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात ।
तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥
या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक ।
उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥
या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन ।
या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥
गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता ।
ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥
अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे ।
संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥
५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख ।
यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥
उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥
अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें ।
अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥
तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके ।
प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥
प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत ।
तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥
प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात ।
प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥
अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न ।
तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥
तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष ।
इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥
अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें ।
आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥
प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख ।
वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर ।
कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥
ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक
जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥
गी ५१६
ज्ञानेश्व
जिसने यह जान लिया वह मुक्त है—
पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप ।
प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥
यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया ।
करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥
इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन ।
स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥
शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल ।
रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥
देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता ।
देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥
होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक ।
तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥
यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण ।
उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥
ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय—
सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख ।
हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥
जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस ।
चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥
अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे ।
आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥
ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं ।
सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥
५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे ।
और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर ।
पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥
तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते ।
गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥
हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते ।
जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥
उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते ।
तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥
सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल ।
शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय ।
निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥
जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख ।
उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥
कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है—
अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित ।
सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥
स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब ।
तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१८
इससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज ।
यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥
इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर ।
पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया ।
तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न ।
जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥
अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन ।
होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥
अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे ।
अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥
वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण ।
करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न ।
नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥
समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥
समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर ।
अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥
५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
जैसे पटत्व नही है तंतु । किंतु पटका आधार तंतु ।
यह प्रज्ञा-दृष्टिसे जान तू । ऐक्य भाव ॥ ५६ ॥
सब भूतोंका आधार । एक ही है तत्व-सार ।
दीखते भिन्न आकार । देखनेमें ॥ ५७ ॥
इनके नाम अनेक । व्यवहार भी अनेक ।
तथा रूप भी अनेक । दीखते हैं ॥ ५८ ॥
देख कर यह अर्जुन । करेगा द्वैत-भाव मन ।
मुक्त होना अवश्य जान । जन्म-मरणसे ॥ ५९ ॥
जैसे अनेक कारणसे । लगते नाना आकारसे ।
लतामें अगणित जैसे । फल कुमडेके ॥ १०६० ॥
अथवा बेरकी जो लकडी । सरल हो अथवा हो टेढी ।
वस्तु एक है खडी या पडी । वैसे वह तत्व ॥ ६१ ॥
जैसे अग्निकण अनेक । उसकी दाहकता एक ।
वैसे जीव-राशि अनेक । एक परतत्व ॥ ६२ ॥
वर्षाधार गगन भर । उसमें एक ही है नीर ।
वैसे हे नाना भूताकार । सबमें ईश एक ॥ ६३ ॥
भूतग्राम सब विषम । सबमें वस्तु एक सम ।
घर घरमें होता व्योम । एकसा जैसे ॥ ६४ ॥
नाश होने पर भूताभास । आत्मा होता एक अविनाश ।
जैसे अलंकार है विशेष । उसमें एक स्वर्ण ॥ ६५ ॥
जैसे जीव-धर्म हीन । तथा जीवसे अभिन्न ।
देखता जो सु-नयन । ज्ञानियोंमें ॥ ६६ ॥
ज्ञान-दृष्टिमें अर्जुन । होता है जो सु-नयन ।
वही बडा भाग्यवान । नहीं यह बढा ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२०
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी ।
पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥
पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक ।
अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥
शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे ।
अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥
ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है—
किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार ।
तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥
अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर ।
योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥
आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार ।
तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥
मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति ।
गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥
वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें ।
न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥
सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे ।
रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥
ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता ।
कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥
जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं ।
आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥
(66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन ।
साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥
मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष ।
करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥
गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता ।
बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥
वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ ।
आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥
ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय ।
उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥
वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न ।
भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥
लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर ।
किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥
या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव ।
विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥
करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब ।
अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥
जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब ।
उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ५२२