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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 584

सभी यह तीनों जान । कार्य कर्तृत्व कारण ।
प्रकृति मूल श्रीकृष्ण । कहता यहां ॥ ७१ ॥
ऐसे तीनोंके ही समन्वयसे । प्रकृति होती है कर्म-रूपसे ।
फिर जो गुण बढ़ाता है जैसे । लेती है वह रूप ॥ ७२ ॥
सत्व-गुणसे जो बनता । वह सत्कर्म कहलाता ।
रजसे जो है निपजता । वह है मध्यम ॥ ७३ ॥
जिसका आधार है तम । ऐसे होते हैं सब काम ।
कहलाते हैं वे अधम । जान तू यहां ॥ ७४ ॥
ऐसे होते हैं प्रकृतिसे । भले बुरे कर्म जो जैसे ।
उत्पन्न होते हैं उनसे । सुख दुःख ॥ ७५ ॥
असत्कर्मसं दुःख उत्पन्न । सत्कर्मसे है सुख अर्जुन ।
उन दोनोंको कहते जान । भोग पुरुषका ॥ ७६ ॥
सुख दुःख सब जब तक । सच मानते हैं तब तक ।
प्रकृति कर्मरत है देख । औ' पुरुष भोगता ॥ ७७ ॥
प्रकृति पुरुषका संसार । अति असंगत धनुर्धर ।
लाती है भार्या जो कमाकर । खाता है भर्त्ता ॥ ७८ ॥
तथा भर्त्ता भार्या परस्पर । नहीं करते संग संसार ।
और सुनो यह चमत्कार । प्रकृति जनती जग ॥ ७९ ॥
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥ २१ ॥
प्रकृतिके गुणोंसे होने वाला भास—
यह भर्त्ता है निराकार । निष्क्रिय निर्गुण है और ।
जरा-जीर्ण है धनुर्धर । वृद्धातिवृध्द ॥ ९८० ॥
बंधा है प्रकृतीसे जो उसके गुण भोगता ।
शुभाशुभ जन्म पाता प्रकृति-संगसे यह ॥ २१ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१२