ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह है नादका टंकसाळ । सकल चमत्कारका स्थल ।
अथवा करती सब खेल । अखिल विश्वका ॥ ९४ ॥
उत्पत्ति प्रलय जो पार्थ । इसके सब सायं-प्रात ।
यह सब अति अद्भुत । मोहका सारा ॥ ९५ ॥
अद्वयकी दूसरी मूर्ति । मानो निःसंगकी साथी ।
शून्यके घरमें वस्ति । धनंजय ॥ ९६ ॥
उसका है पांडुकुमार । सौभाग्य-व्याप्तिका विस्तार ।
अनावृत पुरुष पर । डालती आवरण ॥ ९७ ॥
सदा है वह निर्विकार । बनती उसके विकार ।
वहां यह सब प्रकार । बनती आप ॥ ९८ ॥
उस स्वयंभूकी है उत्पत्ति । उस अमूर्तकी जो है मूर्ति ।
तथा बनती स्थिति-प्रकृति । स्वयं आप ॥ ९९ ॥
उस अनार्तकी यह आर्त । तथा पूर्णत्वकी यह तृप्त ।
उस अकुलकी जात-गोत । बनती यही ॥ १००० ॥
अवर्णनीयका वर्णन । उस अपारका प्रमाण ।
तथा उस अमनस्कका मन । बुद्धि भी बनती ॥ १ ॥
उस निराकारका आकार । तथा निष्व्यापारका व्यापार ।
निरहंकारका अहंकार । बन बैठती है ॥ २ ॥
उस अनामका नाम । तथा अजन्मका जन्म ।
स्वयं होती यह कर्म- । क्रिया उसकी ॥ ३ ॥
उस निर्गुणके गुण । अ-चरणके चरण ।
अ-श्रवणके श्रवण । अ-चक्षुके चक्षु ॥ ४ ॥
उस भावातीतका है भाव । निरवयवके अवयव ।
अथवा बनती है सर्व । उस पुरुषका ॥ ५ ॥
इस भांति यह प्रकृति । बढाकर अपनी व्याप्ति ।
विकृति जालमें फंसाती । अविकारीको ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१४