सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 579

वैसे अनेक भूत-जात । उस एकसे ही व्याप्त ।
विश्व-कार्यका वही पार्थ । कारण एक ॥ १९ ॥
इसीलिये सब भूताकार । जिसका एक-मात्र आधार ।
जैसे तरंगोंका है सागर । आधार एक ॥ ९२० ॥
बाल्यादि स्थितियोंमें जैसे । शरीर है एक ही वैसे ।
सृष्टि-स्थिति-लयमें वैसे । अखंड है वह ॥ २१ ॥
सायं प्रातः पाध्यान्ह । चलता दिनमान ।
किंतु जैसे गगन । रहे एक-सा ॥ २२ ॥
सृष्टि-वेलामें प्रियोत्तम । कहते हैं जिसको ब्रह्म ।
व्याप्तिमें है जो विष्णु नाम । पडा उसको ही ॥ २३ ॥
मिटता है जब आकार । रुद्र तब प्रलयंकर ।
रहता तब शून्याकार । मिटते गुणत्रय ॥ २४ ॥
निगलकर नभका शून्य । मिटाकर जो गुणको अन्य ।
रहता है शून्य महाशून्य । श्रुति-वचन ऐसा ॥ २५ ॥
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १७ ॥
अग्निका जो दीपन । चंद्रका जो जीवन ।
सूर्यके हैं नयन । देखते जिससे ॥ २६ ॥
सदैव जिसका उजियाला । प्रकाशता तारागण-माला ।
जिससे महा-तेज है खिला । सुखसे सर्वत्र ॥ २७ ॥
जो है आदिका आदि । तथा वृद्धिकी वृद्धि ।
बुद्धिकी भी है बुद्धि । जीवका जीव ॥ २८ ॥
कहाता तेजका तेज तथा तम तमांधका ।
ज्ञानका ज्ञान जो ज्ञेय सबका हृदयस्थ है ॥ १७ ॥
५०७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग