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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 588

इसलिये केवल पुरुष । नहीं भोगता है कुछ देख ।
यहां गुण-संग ही अशेष । लगता मूलमें ॥ १०२० ॥
उपद्रष्टानुमंता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२ ॥
अजी ! यह खड़ा है प्रकृतिमें । आधार-स्तंभसा लता बीचमें ।
अंतर जो है धरणी नभमें । वही इनमें है ॥ २१ ॥
तीरमें प्रकृति सरिताके । खडा मेरु-सा बन करके ।
प्रवाहमें स्थिर है इसके । प्रतिबिंब मात्र ॥ २२ ॥
प्रकृति होती है प्रवाहित । स्थिर रहता यह सतत ।
तभी इसमें होता शासित । ब्रह्मांड सारा ॥ २३ ॥
प्रकृति है इससे ही जीवित । इसकी सत्तासे ही वस्तुजात ।
प्रसवती तभी है यह कांत । होता प्रकृतिका ॥ २४ ॥
अनंत-कालसे अर्जुन । सृष्टि होती यह उत्पन्न ।
तथा होती इसीमें लीन । कल्पांतमें ॥ २५ ॥
तभी है यह प्रकृतिका ईश । ब्रह्मांडका सूत्रधार विशेष ।
इसे तोलता रहता अशेष । पांडुकुमार ॥ २६ ॥
अजी ! सुन इस शरीरमें । परमात्म है ऐसे बोलनेमें ।
आता है जो इसीके विषयमें । जान ले तू ॥ २७ ॥
प्रकृतिके उस पार एक । कोई है कहते सभी देख ।
वह यही परम पूरुष । जान तत्वतः ॥ २८ ॥
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
सर्व-साक्षी अनु-ज्ञाता भर्ता भोक्ता महेश्वर ।
कहते परमात्मा है देहमें पर- पूरुष ॥ २२ ॥
ऐसा पुरुषका रूप प्रकृतिका गुणात्मक
जानता जो यह ऐसा न कभी जन्मता फिर ॥ २३ ॥
गी ५१६
ज्ञानेश्व