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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 580

मनका है जो मन । नेत्रका है नयन ।
कानका है जो कान । वाचाकी वाचा ॥ २९ ॥
प्राणका है जो प्राण । गतिके है चरण ।
क्रियाका कर्तापन । जिससे है ॥ ९३० ॥
आकारता जिससे आकार । विस्तारता उससे विस्तार ।
संहारता उससे संहार । धनंजय यहां ॥ ३१ ॥
जो है मेदिनीकी मेदिनी । जो पानीको पीकर पानी ।
तेजका प्रकाश-दायिनी । महा-तेजशक्ति ॥ ३२ ॥
वायुका है वह श्वासोच्छ्वास । तथा गगनका अवकाश ।
इन सबका है जो आभास । आभासता जिससे ॥ ३३ ॥
अथवा है यह अर्जुन । सबमें है सर्वस्व पूर्ण ।
वहां नहीं होता दर्शन । द्वैतका कभी ॥ ३४ ॥
होते ही इसका दर्शन । मिटता दृश्य-द्रष्टा पूर्ण ।
हो जाता है जब मिलन । समरस भावसे ॥ ३५ ॥
फिर होता वहीं ज्ञान । ज्ञाता ज्ञेयका दर्शन ।
औ' ज्ञानसे प्राप्ति-स्थान । वह भी यही ॥ ३६ ॥
जैसा समाप्त होते लेख । संख्या सब हो जाती एक ।
वैसे साध्य-साधनादिक । आता एकत्वमें ॥ ३७ ॥
जिस स्थानमें अर्जुन देख । नहीं होता द्वैतका उल्लेख ।
वही होता हृदयमें एक । भूतमात्रके ॥ ३८ ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८ ॥
कहा है अल्पमें क्षेत्र वैसे ही ज्ञान ज्ञेय भी ।
जानके भक्त है मेरा पाता सायुज्य है मम ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५०८