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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 589

जिसने यह जान लिया वह मुक्त है—
पुरुषका जो शुद्ध-रूप । संपूर्ण जानता है आप ।
प्रकृतिके क्रिया कलाप । गुण हैं सारे ॥ २९ ॥
यह रूप तथा यह छाया । यह जल तथा यह माया ।
करना निर्णय धनंजय । ऐसा सभी ॥ १०३० ॥
इस प्रकारसे अर्जुन । प्रकृति पुरुष विवेचन ।
स्पष्ट करता जिसका मन । सदा सर्वत्र ॥ ३१ ॥
शरीरसे रखके मेल । करता है कर्म सकल ।
रहता नभसा निर्मल । असंग हो ॥ ३२ ॥
देहमें वह ऐसा रहता । देह-मोहसे नहीं भ्रमता ।
देह-पातपे नहीं जन्मता । फिरसे वह ॥ ३३ ॥
होता है जब यह एक । प्रकृति पुरुष विवेक ।
तब करता अलौकिक । महदुपकार ॥ ३४ ॥
यह विवेक-भानुके समान । उजलायेगा अंतःकरण ।
उसके उपाय अनेक सुन । कहता हूं मैं ॥ ३५ ॥
ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
आत्मानात्म विवेक-साधनका उपाय—
सुन तू अर्जुन कई एक । विचार-रूपी अग्निमें रख ।
हीन कसका जो सुवर्णक । पुट देकर ॥ ३६ ॥
जलाते सभी सैंतीस । अनात्म-भेद सर्वस ।
चुनते हैं शुद्ध-शेष । आत्म-तत्व ॥ ३७ ॥
अपने ही हियमें उसे । देखते अपनी दृष्टिसे ।
आप ही सदा अपनेसें । पांडुकुमार ॥ ३८ ॥
ध्यानसे देखता कोई आत्माको हियमें स्वयं ।
सांख्य-योग तथा कोई पाते हैं कर्म-योगसे ॥ २४ ॥
५१७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग