ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआकाशका नहीं होता आकार । दीखता जैसे वह सर्वाकार ।
अकाशपे नहीं होते विकार । वैसी वह वस्तु ॥ ९८ ॥
मन मुख्य इंद्रियोंसे । तथा सन्त्वादि गुणसे ।
आकार लेता है वैसे । दीखता यहां ॥ ९९ ॥
जैसे मीठेकी जो मिठास । न होती आकारमें खास ।
नहीं होता वह विशेष । गुणोंद्रियोंमें ॥ १०० ॥
अजी ! है दूधकी स्थितिमें । घृत होता उसी रूपमें ।
तथा दूधके अभावमें । घृत ही घृत ॥ १ ॥
यहां है वह विकारसे । विकृत नहीं होता वैसे ।
गहना आकार नामसे । नहीं तो सोना सोनाही ॥ २ ॥
यहां यदि स्पष्ट रूपसे । कहना हो सरलतासे ।
वह है गुण-इंद्रियोंसे । भिन्न तत्व ॥ ३ ॥
नभ-रूपका संबंध । जाति क्रिया आदि भेद ।
यह आकार प्रवाद । तत्वका नहीं ॥ ४ ॥
अजी ! वह कोई भी गुण नहीं । गुणसे उसका संबंध नहीं ।
किंतु गुणोंको उसके तईं । होता भास ॥ ५ ॥
यहां इसी कारणसे । मति संभ्रम होनेसे ।
उसमें विकार ऐसे । देखते हैं ॥ ६ ॥
उन विकारोंका धारण । जैसे बादलोंको गगन ।
या है प्रतिबिंब दर्पण । करते वैसे ॥ ७ ॥
अथवा सूर्य प्रति मंडल । धरता है पृथ्वीपे सलिल ।
या रश्मि-करमें मृगजल । धरता वैसे ॥ ८ ॥
वैसे है संबंधके बिन । सबको धरता निर्गुण ।
किंतु वह है व्यर्थ जान । भ्रांत-दृष्टि ॥ ९ ॥
इस भांति है निर्गुण । भोगता है सब गुण ।
रंकका राज धारण । स्वप्नमें जैसे ॥ ९१० ॥
(64) ५०५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग