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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 590

और कुछ दैव-योगसे । चित्त देते सांख्य-योगसे ।
और कुछ कर्माचरणसे । देखते वह तत्व ॥ ३९ ॥
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
ऐसे सुन पांडुकुमार । तर जाते भव-भंवर ।
पाके कुछ अन्य प्रकार । भली भांतिसे ॥ १०४० ॥
तब वह ऐसा करते । अभिमान सभी तजते ।
गुरुपे विश्वास रखते । पूर्ण-रूपसे ॥ ४१ ॥
हित अहित सब देखते । हानि देख दयासे भरते ।
जानकर दुःख भी हरते । तथा देते हैं सुख ॥ ४२ ॥
उनके मुखसे जो शब्द निकलते । सब वे अति-आदरसे सुनते ।
तथा तन मनसे वैसे ही बनते । पांडुकुमार ॥ ४३ ॥
सुननेके लिये ही केवल । करते हैं कर्तव्य सकल ।
शब्द पर निष्ठासे अचल । होते निछावर ॥ ४४ ॥
सुन तू यह धनंजय । मरणार्णवसे निर्भय ।
निकलते हो अमृतमय । भली भांति ॥ ४५ ॥
जाननेके हैं अनेक । उपाय यहां हैं देख ।
उससे जानना एकं । परम तत्व ॥ ४६ ॥
कोई भाग्यवान ही विश्वकी विविधतामें एकता देख सकता है—
अब हुआ यह बहुत । किंतु सर्वार्थका मथित ।
सिद्धांत तत्व-नवनीत । देता हूं तुझे ॥ ४७ ॥
स्वयं न जानके कोई बड़ोंसे सुनके सब ।
तरते मृत्युको वे भी श्रद्धासे कर वर्तन ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५१८