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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 593

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी ।
पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥
पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक ।
अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥
शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे ।
अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥
ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है—
किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार ।
तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥
अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर ।
योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥
आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार ।
तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥
मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति ।
गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥
वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें ।
न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥
सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे ।
रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥
ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता ।
कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥

जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं ।
आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥
(66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग