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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 594

इसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन ।
साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥
मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष ।
करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥
गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता ।
बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥
वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ ।
आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥
ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय ।
उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥
वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न ।
भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥
लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर ।
किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥
या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव ।
विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥
करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब ।
अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥
जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब ।
उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ५२२