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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 581

आत्माके एकत्वका विवेचन-आत्मानात्म विचार-
इस प्रकारसे पार्थ । पहिलेसे ही निश्चित ।
स्पष्ट किया क्या है खेत । विवेचनसे ॥ ३९ ॥
वैसे ही क्षेत्र-दर्शन । करने दिये नयन ।
कहते हैं जिसे ज्ञान । कहा वह भी ॥ ४० ॥
वैसे ही अज्ञान लक्षण । किये सविस्तर वर्णन ।
जिसे सुनकर अर्जुन । थका होगा तू ॥ ४१ ॥
तथा स्पष्टतासे पार्थ । कहा देकर दृष्टांत ।
ज्ञेय-स्वरूप निश्चित । समझाके ॥ ४२ ॥
यह जो विवेचन संपूर्ण । करता है हृदय ग्रहण ।
मत्सिद्धि भावना प्राण । करता सहज ॥ ४३ ॥
तब देहादिका परिग्रह । होता है संन्यास निराग्रह ।
तथा प्राण होता निरीह । सेवक मेरा ॥ ४४ ॥
तब वे मैं ही हूं अर्जुन । अंतिम आसरा है जान ।
कर मुझे चित्त अर्पण । होते मद्रूप ॥ ४५ ॥
मद्रूप होनेका पथ । .रचाया सुन तू पार्थ ।
सुलभ और निश्चित । हमने यह ॥ ४६ ॥
चढनेमें जैसे सीढी रचते । अथवा ऊपर मंच बांधते ।
तथा अपनी नांव भी रखते । तैरने पूरमें ॥ ४७ ॥
सब कुछ है यदि यहां आत्मा । ऐसा कहता तो मैं वीरोत्तम ।
ग्रहण न करना मनो-धर्म । यह बात मेरी ॥ ४८ ॥
इसीलिये था जो एकाकार । कर बताये चार प्रकार ।
देखके तेरी पांडुकुमार । मंद बुद्धि ॥ ४९ ॥
शिशुको जब खिलाते । ग्रास बीस कर देते ।
वैसे ही चार कहे ये । हमने एकके ॥ ५० ॥
५०९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग