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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 575

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में सटीक लिप्यंतरण है:

तथा वह सर्वत्र समस्त । स्थानमें होता है प्राप्त ।
सभी रूपमें पूर्ण-दर्शित । सो विश्वतःपाद ॥ ७५ ॥
सविताको जैसे नहीं नयन । अवयव में दीखते हैं भिन्न ।
किंतु करता सबका दर्शन । वह स्वरूप ॥ ७६ ॥
इसीलिये वह विश्वतचक्षु । वास्तवमें होकर जो अचक्षु ।
कहलाता बोलनेमें जो वृक्ष । वेदसे भी ॥ ७७ ॥
जो है सबके शिर पर । रहता है नित्य तत्पर ।
आत्म-सत्तासे होके स्थिर । तभी है विश्वमूर्ध्ने ॥ ७८ ॥
जैसे संपूर्ण मूर्ति ही मुख । हुताशनका वैसे है देख ।
वैसे है सर्व-मुखसे अशेष । है वह भोक्ता ॥ ७९ ॥
इसीलिये सुन पार्थ । विश्वतोमुख व्यवस्था ।
चली आयी है वाक्प्रथा । श्रुतिसे ही ॥ ८८० ॥
वस्तु-मात्रमें गगन । जैसे रहता संलग्न ।
वैसे शब्दमें हैं कान । जिसको सर्वत्र ॥ ८१ ॥
इसीलिये हम जिसे । सभी सुनता है वैसे ।
कहते हैं सदा जिसे । विश्व-व्यापक ॥ ८२ ॥
वैसे तो सुन महामती । विश्वतः चक्षु आदि श्रुति ।
दिखाती है उसकी व्याप्ति । मूर्तिरूपसे ॥ ८३ ॥
इसीलिये नेत्र-पाद-हस्त । सभी भाषा है व्यर्थ ।
तथा शून्य भी अयुक्त पार्थ । 'वर्णनमें यहां ॥ ८४ ॥
कल्लोल निगलता कल्लोल । यही देखते हम सकल ।
ग्रासता ग्राससे जो सलिल । भिन्न है क्या ॥ ८५ ॥
वैसे सत्य ही जो एक । जो है व्याप्त औ' व्यापक ।
किंतु भाषा-हेतु देख । होता है भेद ॥ ८६ ॥
होता है जब शून्य दिखाना । पडता है बिंदु ही लिखना ।
वैसे जब अद्वैत कहना । द्वैतकी भाषामें ॥ ८७ ॥
५०३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग