ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयहां जो पुरुषत्व होता । प्रकृति कारण बनता ।
अमावास्यमें रहता । चन्द्रमा जैसे ॥ ७ ॥
जैसे अति-स्वच्छ सुवर्ण । मिलकर जस्तके कण ।
बनता जाता है जो हीन । उसी भांति ॥ ८ ॥
या बनता जैसे सज्जन । पिशाच-संगसे है हीन ।
बादल व्याप्त हो गगन । दुर्दिन करता ॥ ९ ॥
या पय होता पशुके स्तनमें । अथवा अग्नि होता लकडीमें ।
तथा लपेट लिया है वस्त्रमें । नंदादीप ॥ १०१० ॥
जब होता राजा पराधीन । तथा सिंह रोगके आधीन ।
वैसे पुरुषत्व तेज-हीन । होता प्रकृतिमें ॥ ११ ॥
जगता हुवा मनुष्य जैसे । यकायक निद्रित होनेसे ।
स्वप्नमें दुःख भोगता वैसे । यहां वह ॥ १२ ॥
वैसे प्रकृतिके आधीन । भोगता है पुरुष गुण ।
जैसे विरक्त स्त्री-आधीन । उखडता है ॥ १३ ॥
वैसे ही अज नित्यका जो होता । जन्म-मृत्यु सहना पडता ।
प्रकृति-गुण संगसे होता । सभी यह ॥ १४ ॥
किंतु यह जैसे पांडुसुत । तप्त लोहपे होता आघात ।
तब अग्निको होते हैं घान । मानते वैसे ॥ १५ ॥
या आंदोलनसे उदक । प्रतिभा होती है अनेक ।
उसे कहे नानात्व लोक । चंद्रका जैसे ॥ १६ ॥
या पास होनेसे दर्पण । एकके दो दीखते आनन ।
या कुंकुमसे रक्त-वर्ण । आता स्फटिकमें ॥ १७ ॥
गुण संगसे ऐसा होता । अजन्मा है जनम लेता ।
ऐसा यह आभास होता । अन्यथा नहीं ॥ १८ ॥
अधमोत्तम योनि वैसे । मानते हैं इसको ऐसे ।
संन्यासी स्वप्नमें ही जैसे । बनता अंत्यज ॥ १९ ॥
५१५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग