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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 585

वह नाम मात्रका है पुरुष । नहीं नर नारी जो नपुंसक ।
अथवा मानो नहीं जाने एक । क्या है निश्चित ॥ ८१ ॥
वह है अचक्षु अश्रवण । तथा जो अ-हस्त अ-चरण ।
जिसका नहीं रूप औ' वर्ण । नाम भी नहीं ॥ ८२ ॥
जहां कुछ भी नहीं है पार्थ । देखती वहां प्रकृति भर्ता ।
इससे उसे भोगना होता । सुख दुःख ॥ ८३ ॥
वह है जो अकर्ता । उदास औ' अभोक्ता ।
किंतु है पतिव्रता । भोगती है ॥ ८४ ॥
उसके गुण-रूपका मेल । कर दिखाता है बड़ा खेल ।
दिखाती झांकी वह केवल । धनुर्धर ॥ ८५ ॥
इस प्रवृत्तिको यहां अब । गुण-मयी कहते हैं सब ।
अथवा वह गुणोंकी सब । मूर्ति ही है ॥ ८६ ॥
प्रति-पलमें यह नित्य-नूतन । दिखाती है गुणोंका रंग अर्जुन ।
जिससे जड़ भी उन्मादित मन । होते उन्मत्त ॥ ८७ ॥
यही है नामको प्रसिद्ध । करती है स्नेहसे स्निग्ध ।
होती हैं इंद्रियां प्रबुध्द । इससे ही ॥ ८८ ॥
अजी ! कहते हैं मन नपुंसक । किंतु भोगती वह तीनो लोक ।
ऐसे ऐसे हैं इसके अलौकिक । करतूत सारे ॥ ८९ ॥
भ्रमका यह महा-द्वीप । व्याप्तिका है सुंदर रूप ।
विकार इसके अमाप । सभी प्रकारके ॥ ९९० ॥
यह है कामकी मांडवी । मोह-वनकी जो माधवी ।
इसको कहते हैं “देवी- । माया” है यह ॥ ९१ ॥
यह है वाङ्मयका विस्तार । नाम-रूप करती साकार ।
प्रपंच जाल जो निरंतर । फैलती अभंग ॥ ९२ ॥
कालकी है यही जाया । विद्याको इसने किया ।
इच्छा ज्ञान तथा क्रिया । इसीसे जान ॥ ९३ ॥
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(65) क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग