सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 591, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 591

इससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज ।
यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥
इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर ।
पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया ।
तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न ।
जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥
अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन ।
होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥
अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे ।
अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥
वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण ।
करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न ।
नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥
समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥
समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर ।
अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥
५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग