सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत ।
विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥
लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर ।
सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥
सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा ।
भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन ।
करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥
ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप ।
किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥
गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता ।
इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥
उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर ।
वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर ।
अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥
प्रभो गदा चक्र किरीट धारी
प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड ।
देखा न जाता वह अप्रमेय
जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥
३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

भक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश—
ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत ।
वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥
वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध ।
रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥
तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश ।
विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥
किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज ।
हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥
यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं ।
अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥
इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता ।
ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥
यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव ।
युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥
अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल ।
दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥
अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल ।
देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥
अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ ।
उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥
तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश ।
करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥
तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित ।
तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्
अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो—
हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर ।
श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥
आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान ।
वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥
धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन ।
सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥
तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत ।
विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥
असीम तू अक्षर जाननेका
तू ही महा आश्रय विश्वका है ।
तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य
मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥
अनादि मध्यांत अनंत शक्ति
अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति ।
आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य
स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥
(46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला ।
कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥
इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत ।
तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥
आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत ।
जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥
इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा ।
करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
जो देख अकुला रहा त्रिलोक —
भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल ।
दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥
तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक ।
गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥
या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त ।
वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥
अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण ।
सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥
सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष
सर्वत्र तू एक हि छा रहा है ।
तेरा यही अद्भुत उग्र रूप
जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३६२

तुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर ।
डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥
वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान ।
जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥
जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा ।
देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥
आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन ।
पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥
तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार ।
आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥
ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त ।
मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥
संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ ।
तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥
ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत ।
उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना—
ये देव सारे तुझमें समाये
कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त ।
मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत
स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥
३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

तेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज ।
जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥
तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित ।
गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥
देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें ।
फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥
ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त ।
आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥
तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध ।
गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव ।
अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥
सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व ।
महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥
ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन ।
महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥
आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य
कुमार दोनों पितृ-देव वायु ।
गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध
सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी
३६४

फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण ।
नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥
जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर ।
रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥
वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ ।
तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय ।
तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥
रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख ।
देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥
ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र ।
बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥
अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण ।
प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥
अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय ।
प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥
या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र ।
अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥
विशाल है रूप असंख्य नेत्र
करालं दाढें मुख हाथ पैर ।
अनेक हैं ऊरु विशाल पेट
ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥
३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग

वैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर।
वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥
देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार।
वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥
कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण।
वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥
बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार।
वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥
रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर।
त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥
क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता।
इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥
देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण।
कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥
संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे।
ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥
महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप।
इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
आकाश भेदे बहुरंगवाले
खुले मुखोंके विशाल नेत्र।
ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव
अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६६

महाकालसे हठ छोड़कर । अनेक मुख जो क्रोधसे भर ।
आकाशको ओछा मान विस्तार । दिखाते हैं अपना ॥ ५३ ॥
नभ-विस्तार न करता आकलन । त्रिलोक पवन न करता वेष्टन ।
जिसमेंसे ज्वाला निकलती महान । धधकती हुई ॥ ५४ ॥
इनमें हैं विविध आकार । वैसे ही हैं वर्णके प्रकार ।
प्रलयाग्नि भी लेता आधार । इन मुखोंका ॥ ५५ ॥
इतना है इनके अंगका तेज । इनसे राख होता विश्व सहज ।
एक मुखमें मुख उनमें तेज । दांत औ' दाढ भी ॥ ५६ ॥
हुवा यहां मानो वायुको धनुर्वात । समुद्र हुवा महापूरमें पतित ।
विषाग्नि मारनेमें हुवा प्रवृत्त । बड़वानलको ॥ ५७ ॥
पीता है जैसे अग्नि हालाहल । मृत्यु मरनेमें सन्नद्ध है नवल ।
संहार तेज आज निगलता खोल । मुख बन कर ॥ ५८ ॥
किंतु कैसे हैं ये विशाल । जैसे टूटा हुवा अंतराल ।
मानो आकाशका ही बिल । पड़ा है यह ॥ ५९ ॥
या वसुंधराको बगलमें दबाकर । हिरण्याक्ष घुसा जब पाताल गव्हर ।
पाताल कुहर खोला हाटकेश्वर । वक्त्र दीखते ऐसे ॥ ३६० ॥
तेरे मुखोंका ऐसा विकास । उसमें जिह्वाओंका आवेश ।
विश्व बनता अधूरा ग्रास । इसीलिये नहीं खाता ॥ ६१ ॥
तथा पातालव्यालोंका फूत्कार । विष ज्वाला जा छूती हैं अंबर ।
वैसी फैली है जिव्हा भयंकर । बदन-दरीमें ॥ ६२ ॥
प्रलय-विद्युतके झुंड लेकर । सजाये हैं जैसे गगन शिखर ।
मुखमें दीखते हैं दांत प्रखर । तथा दाढ भी वैसे ॥ ६३ ॥
जैसे ललाट परके अंचलमें । भयको ही डराते हैं अंधारमें ।
महा-मृत्युके हैं आवेग वेगमें । अंगार-सी आंखें ॥ ६४ ॥
ऐसा ले यह महा-भयका भोज । यहां क्या करने आया है तू काज ।
समझ न पा करके यह मुझ । मरण भय आया है ॥ ६५ ॥
३६७ विश्व रूप-दर्शनयोग

देव ! विश्व रूप देखनेकी आस । उसका प्रतिफल है यह खास ।
उसको देखा है मैंने स-हव्यास । हुईं अब आंखें शांत ॥ ६६ ॥
शरीर है यह नाशवंत पार्थिव । उसका नहीं है यहां विशेष भाव ।
अविनाशी चैतन्यका न रहा ठाव । जीने मरनेका ॥ ६७ ॥
भयमें है वैसे अंग कांपता । बढता है तब मन तापता ।
अथवा बुद्धिका बल हिलता । गलता अभिमान ॥ ६८ ॥
इन सबसे जो है निराला । केवल जो आनंदैककळ ।
वह अंतरात्मा भी निश्चळ । कांपता यहां ॥ ६९ ॥
लगा साक्षात्कारका वेध । नष्ट किया है सब बोध ।
ऐसा गुरु-शिष्य संबंध । मिलेगा कहां ॥ ३७० ॥
देवेश ! तेरा जो यह दर्शन । शिथिल करता अंतःकरण ।
उसको संभालनेमें जतन । करता हूं मैं ॥ ७१ ॥
धैर्य जो मेरा संपूर्ण खो गया । तूने यह विश्व-रूप दिखाया ।
तथा मुझको है उलझा दिया । उपदेशमें ॥ ७२ ॥
यहां आसरा पानेमें जीव । करता है चारों ओर धांव ।
उसको नहीं मिलता ठाव । इस रूपमें ॥ ७३ ॥
विश्व-रूप ऐसा महामार । निर्जीव करता है चराचर ।
तब रहे कैसे मौन होकर । देव देवेश ॥ ७४ ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
दृष्ट्रैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
कल्पांत अग्नीसम दीखतें है
प्रचंड मुख औ' कराल दाढ ।
दिशा न सूझे मुख-शांति नाशे
प्रसन्न हो तू जगके निवास ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६८

सबका नाश करनेवाली दैवी शक्ति—
फूटा महा-मृत्युका मशक । ऐसे जो तेरे मुख अनेक ।
नाचते हैं आंखोंके सम्मुख । फैले हुए ॥ ७५ ॥
दांत औ' डाढोंकी खुली कतार । ओंठ न छिपा सकते प्रखर ।
प्रलय-शस्त्रोंका पडा है घेर । लगा है जैसे ॥ ७६ ॥
तक्षमें भरा हालाहल जहर । काल-रात्रिमें हुवा भूत-संचार ।
या आया वज्राग्नि-अग्न्यस्त्र धर । वैसा यह रूप ॥ ७७ ॥
वैसे ही तेरा वदन बिकराल । उसमें मृत्यु-रसका रेलारेल ।
फिर आवेश उमडता विपुल । हम पर ही ॥ ७८ ॥
संहार-कालका चंडानिल । महाकल्पका प्रलयानल ।
हुवा दोनोंका संहार-मेल । फिर न जलेगा क्या ॥ ७९ ॥
वैसे तेरे ये संहारमुख । देखा हुवा मेरा धैर्य खाख ।
भूला मैं अब दिशा भी देख । तथा अपनेको भी ॥ ३८० ॥
विश्व-रूप देखा क्षण काल । तथा पडा सुखका अकाल ।
समेट ले तू रूप विशाल । जो है अस्त-व्यस्त ॥ ८१ ॥
ऐसा करेगा तू यह यदि जानता । विश्व-रूपकी मैं बात भी क्यों करता ।
रक्षा कर तू प्राणकी परम-पिता । इस स्वरूप प्रलयसे ॥ ८२ ॥
भगवानका हेतु अर्जुनका मोह —-
यदि तू स्वामी है हमारा अनंत । रक्षण कर डाल बन जीवित ।
समेटले फैलाव अपरमित । महा-मृत्युका ॥ ८३ ॥
सुन तू सकल देवोंका परम देव । चैतन्य तू तुझमें बसता विश्व सर्व ।
भूला तू सबको जीवन देना सदैव । और लगा संहारमें ॥ ८४ ॥
प्रसन्न हो त्वरित देवराय । समेट ले अपना महाकाय ।
उद्धार कर मेरा भय-मय । मृत्यु वशासे ॥ ८५ ॥
करता हूं पुनः पुनः ऐसा विनय । हुआ है इतना भय-ग्रस्त हृदय ।
विश्व रूप देख कर खाया भय । मैने जनार्दन ॥ ८६ ॥
३६९ विश्व-रूप-दर्शनयोग
(47)

हुवा अमरावति पर आक्रमण । किया है मैने अकेलेने निवारण ।
ऐसा मैं महाकालको भी कठिन । डरानेमें ॥ ८७ ॥
किंतु हे यह प्रसंग दुर्धर । मृत्युको भी तूने निगलकर ।
भर लिया है मेरा भी जो कौर । विश्व सह सकल ॥ ८८ ॥
ऐसा नहीं था अब प्रलय काल । बनकर आया है तू महाकाल ।
बेचारा बना त्रिभुवन सकल । अल्पायुषी आज ॥ ८९ ॥
विधि-विधान है यह विपरीत । उठा हुवा बिघ्न करनेमें शांत ।
मह-विघ्न उठ आया अकल्पित । विश्व-प्रलयका ॥ ३९० ॥
बात नहीं यह काल्पनिक । खेलकर तू अनंत-मुख ।
सैन्यका कौर लेता है देख । चहूं ओरसे तू ॥ ९१ ॥
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥
ये सब कुरु-कुलके वीर । अंध धृतराष्ट्रके कुमार ।
गये रे गये स-परिवार । तेरे कराल मुखमें ॥ ९२ ॥
तथा आये हैं यहां जो देश देशके । इनके सहायक हो दौड़ दौड़के ।
न रहेंगे ये तेरे कौर बनके । नाम कहनेको भी ॥ ९३ ॥
मद-मस्त हाथियोंके जो झुंड । निगलता तू पकड पकड़ ।
तथा योद्धाओंको भी धड़ाधड । निगलता जाता ॥ ९४ ॥
शातघ्निके संहारक । पदचारी जो कटक ।
भरता है तेरा मुख । पता न चलता ॥ ९५ ॥
अहा ! सभी ये धृतराष्ट्र पुत्र
लेके सभी राज समूह साथ ।
ये भीष्म ये द्रोण ये सूत पुत्र
औ' वीर सारे अपने अनेक ॥ २६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७०

कृतांतके जो जो हथियार क्रूर । निगलते एकेक स-चराचर ।
निगलता तू ऐसा शस्त्र भांडार । करोडोंका ॥ ९६ ॥
चतुरंग-सेना परिवार । स-अश्व-रथ पकड़कर ।
दांत न लगाते विश्वेश्वर । निगलता तू ॥ ९७ ॥
भीष्मसे ऐसा है कौन । सत्यशौर्यमें प्रवीण ।
तथा जो द्रोण ब्राह्मण । तूने चबाया ॥ ९८ ॥
ओ ! वह सहस्र-कर-कुमार । गयारे गया व्यर्थ जो कर्ण वीर ।
तथा हमारे अनेक महावीर । खा गया तू ॥ ९९ ॥
कैसा हे देव ! यह विधि विधान । मेरी मांगसे विश्व-रूप-दर्शन ।
करता वह विश्वका निकंदन । चाहता था मै शांति ॥ ४०० ॥
तूने कही पहले उपपत्ति । बताई थी यहां कुछ विभूति ।
छोडके वह मैं हो मंदमति । मांगा दर्शन ॥ १ ॥
होनी है जो त्रिकालमें भी नहीं चूकती । बुद्धि भी उसका अनुकरण करती ।
मेरे दैवमें अजी ! यही बात बधीथी । उसका उपाय क्या ? ॥ २ ॥
अमृत भी पहले हाथ आया । देवोंको उससे तोष न भया ।
फिर कालकूटको जन्म दिया । अंतमें जैसे ॥ ३ ॥
किंतु वह था जो किंचित । निराकरण योग्य बात ।
उसे किया है तब शांत । पीके शंभुने ॥ ४ ॥
जलता बवंडर अब कौन लपेटता । विष भरा आकाश कौन निगलता ।
महाकालके कालसे कौन खेलता । सामर्थ्यवान हो ॥ ५ ॥
अर्जुन ऐसे शोकमें गळता । हृदयमें अति संतप्त होता ।
मनोगत वह नहीं जानता । देवदेवेशका यहां ॥ ६ ॥
परमात्मका मनोगत—
कौरव मरते और मैं मारता । अर्जुन ऐसे मोहग्रस्त हुवा था ।
श्रीकृष्णको उसे दूर करना था । यह रूप दिखाके ॥ ७ ॥
३७१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता ।
विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥
नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त ।
तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान ।
खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥
या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत ।
जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥
होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव ।
जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥
दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान ।
किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥
अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे ।
सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥
यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक ।
देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥
सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं —
जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे
भयान जिसमें कराल दाढ ।
चिपके हुए हैं अनेक मुंड
दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७२

दांतोंमें फंसे हैं कुछ रत्न । कुछ चूर्ण हो गये हो भग्न ।
जिव्हा-मूलमें फंसा चूरन । कुछ दांतोंमें ॥ १६ ॥
विश्व-रूप है यह महाकाल । चबाता लोगोंकी देह सबल ।
किंतु जीव देहका शिर-कमल । रखता आवश्य ॥ १७ ॥
वैसे शरीरमें है चोख । उत्तमांग जो शिर सम्मुख ।
महाकालके मुखमें देख । शेष रहे हैं ॥ १८ ॥
कहता है फिर अपनेसे अर्जुन । अन्य गति नहीं जो कुछ हुवा है जनन ।
करते हैं वे इस मुखमें गमन । अपने आप ॥ १९ ॥
यहा हुवा है जो सृष्ट । होता है इस मुखमें प्रविष्ट ।
निगलकर सब होता पुष्ट । विश्व-रूप काल ॥ ४२० ॥
समस्त हैं जो ब्रह्मादिक । स-वेश जाते ऊंचे मुख तक ।
पड़ते हैं जाके सामान्य लोक । इसी ओरके मुखमें ॥ २१ ॥
अन्य सभी हैं जो भूत-जात । जन्मते वही होते ग्रसित ।
किंतु इनका मुख निर्भ्रांत । न छूटता कोई ॥ २२ ॥
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
'विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वल॑ति ॥ २८ ॥
जैसे हैं महानदीके ओघ । डूबते हैं सिंधुमें अथांग ।
वैसे सभी ओरसे हैं जग । जाता इस मुखमें ॥ २३ ॥
आयुष्य पथमें प्राणि-गण । करके अहो रात्र प्रयाण ।
इस मुखमें पाते निधान । अति-वेगसे ॥ २४ ॥
जैसे नदीके जलके प्रवाह
दौडे हुए सागरमें समाते ।
वैसे समाते नर वीर सारे
सवेग तेरे जलते मुखों में ॥ २८ ॥
३७३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥
जलते पर्वत-दरीमें जैसे । पतंग-समूह पडते वैसे ।
समस्त लोक पडते वेगसे । इस मुखमें आज ॥ २५ ॥
प्राणिमात्र जो है इसमें जाता । उसका नाम भी नहीं रहता ।
जैसे सारा पानी है सोख लेता । तपा हुवा लोह ॥ २६ ॥
लेलिह्यसे ग्रसमानः समंता-
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
भासस्तवोग्राः प्रतपंति विष्णो ॥ ३० ॥
तथा कर इतना आरोगन । नहीं होता तेरा क्षुधा-शमन ।
कैसा असामान्य यह दीपन । हुवा उदय ॥ २७ ॥
जैसे ज्वरसे उठा हुवा रोगी । या अकाल मुक्त भिक्षुक भोगी ।
वैसे तेरी जिव्हा है सदा लगी । चरनेमें ही । २८ ।
आहारका वैसे जो जो है नाम । आता तेरे निगलनेका काम ।
नहीं देखी ऐसी क्षुधा असीम । विस्मय जनक ॥ २९ ॥
उडते हुए ये जैसे पतंग
सवेग जाते जलते दियेपे ।
वैसे विनाशार्थ तेरे मुखोंमें
ये लोग सारे सवेग उड़ते ॥ २९ ॥
संसार सारा कर ग्रास होठ
तू चाटता है जलती जिभोंसे ।
लपेट सारा तव उग्र तेज
है तीन लोगोंको जला रहा जो ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ३७४

सागरका जैसे आपोशन करना । तथा मेरु-पर्वतका कौर भरना ।
संपूर्ण ब्रह्मांड ही धरके चबाना । अपनी डाढोंसे ॥ ४३० ॥
सभी दिशाओंको निगल जाना । तारागण नभके चाट जाना ।
ऐसी सहज-लालसा धरना । यह है तेरा काम ॥ ३१ ॥
जैसे भोगसे है काम बढ़ता । ईंधनसे अग्नि धू धू करता ।
वैसे खा खा कर होठ चाटता । अधिक आशासे ॥ ३२ ॥
किया कैसा यह एक ही पसारा । जिह्वाग्रे रखा त्रिभुवन सारा ।
डाला है यह एक छोटासा कौर । वडवानलमें ॥ ३३ ॥
ऐसे हैं जो अगणित वदन । आर्थ कैसे इतने त्रिभुवन ।
इससे क्षुधा न होती सहन । बढती असह्य ॥ ३४ ॥
अजी ! है यह विश्व बेचारा । वदन-ज्वालामें पडा सारा ।
दावानलका पडा है घेरा । भेडों पर यहां ॥ ३५ ॥
विश्वका ऐसा हुआ अब । दैव कर्म नहीं आया तब ।
चराचर पर फैला सब । अकालका जाल ॥ ३६ ॥
विश्व-रूपका यह तेज-मंडल । बहुलियाका फैलाया हुआ जाल ।
मुख नहीं लाक्षाग्नि-ज्वाल । घेरता चराचरको ॥ ३७ ॥
जलाती कैसी अपनी दाहकता । इस बातको अग्नि नहीं जानता ।
किंतु जो जलता है वह जानता । नहीं बचते उसके प्राण ॥ ३८ ॥
अजी ! अपनी तीखी धारसे कैसे । न जानता शस्त्र-घात होता जैसे ।
अपना विनाश न जानता वैसे । हालाहल विष ॥ ३९ ॥
वैसे तुझको भी ज्ञात है नहीं । अपनी उग्रताकी बात सही ।
प्रत्येक मुखसे यहां हो रही । विनाश-लीला ॥ ४४० ॥
यदि तू है आत्मा एक । सकल विश्व-व्यापक ।
तब हमारा अंतक । हो आया कैसे ॥ ४१ ॥
छोडी मैंने जीवितकी आस । तू भी छोड दे संकोच खास ।
कह अपनी भानकी क्या खास । बात है आज ॥ ४२ ॥
३७५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

अपनी उग्रताको क्यों बढ़ाता जाता । अपना ईशत्व तू क्यों नहीं स्मरता ।
विश्व संभालना यदि नहीं चाहता । मेरे लिये ही स्मर तू ॥ ४३ ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥
तुम कौन हो प्रभो ! —
एक बार वेद-वेद्य । त्रिभुवनका तू आद्य ।
विनति है विश्व-वंद्य । सुन तू मेरी ॥ ४४ ॥
ऐसा कह वह वीर । चरणपे रख शिर ।
कहता है सर्वेश्वर । सुन तू विनय ॥ ४५ ॥
अपना करने समाधान । मांग विश्व-रूपका दर्शन ।
औ' एक कालमें त्रिभुवन । निगल उठा तू ॥ ४६ ॥
अजी ! कह तू तब है भी कौन । कहांसे पाये भीषण आनन ।
शस्त्र क्यों लिये इतने महान । चमकाये हैं जो ॥ ४७ ॥
तेरा रुद्र-क्रोध भडक कर । दिखाता गगनको ओछा कर ।
दिखाता है आंखें निकालकर । भयग्रस्त होता विश्व ॥ ४८ ॥
कृतांतसे क्यों इतनी होड़ । कर रहा क्यों तू ऐसा अड़ ।
कह तू मुझसे यह गूढ़ । बात जो देव ॥ ४९ ॥
सुन यह कहता अनंत । कौन तू यह पूछता पार्थ ।
औ' होता क्यों ऐसा वृद्धिगत । उग्रतासे ॥ ४५० ॥
हो कौन बोलो विकराळ रूपी
तुझे नमस्कार देवेश बोलो ।
पहचान चाहूँ देवादिदेव
जानी न जाती करती तुम्हारी ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७६

भगवान् उवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥
मैं सबको संहारनेवाला काल हूं—
जान तू मैं सम्मुख हूं महाकाल। लोक-संहारार्थ बढ़ता कराल।
फैलाये हैं ये जो मुख विकराल। सबको निगलने ॥ ५१ ॥
सुनकर यह अकुलाता पार्थ। पहली बातसे मैं ही संकट-ग्रस्त।
विनय की थी तेरी मैंने अनंत। हुवा प्रकट तू काल ॥ ५२ ॥
इस पर बोलनेसे कठिन। यह निराश होगा यह जान।
सत्वर कहता देव अर्जुन। और एक बात ॥ ५३ ॥
सबका जो यह चला संहार। इसमें रहे पांडव बाहर।
सुनकर यह पांडु कुमार। संभालता प्राण ॥ ५४ ॥
मरण महा-भयसे हो मुक्त। सुनने लगा वह ध्यान-युक्त।
श्रीकृष्ण वचन हो अनुरक्त। धनंजय ॥ ५५ ॥
पांडव तुम मेरे आत्मीय जन। इसलिये तुम्हे छोड़के अर्जुन।
अन्य सबका करने निकंदन। हुवा उद्यत यहां ॥ ५६ ॥
वज्रानलमें जैसे प्रचंड। डालना जैसे नवनीतका पिंड।
मेरे मुखमें वैसे ब्रह्मांड। देखा तूने ॥ ५७ ॥
श्रीभगवानने कहा
मैं काल उठा जग-नाशकारी
संहारने सिद्ध यहां खड़ा हूँ।
तेरे बिना ये सब नष्ट होंगे
जो हैं खड़े सैनिक दोन ओर ॥ ३२ ॥
(48) ३७७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

उसमें नहीं रहेगा कुछ शेष । जान तू होगा यह सब अ-दोष ।
सेनाकी चली है बकवास । व्यर्थकी जान तू ॥ ५८ ॥
बनाकर जो यह सैन्य मिलन । करते हैं विरावेशका गर्जन ।
देखते काल पर विजय स्वप्न । अपने गदा-दंडसे ॥ ५९ ॥
कहते सृष्टि पर सृष्टि करेंगे । प्रतिज्ञासे महाकालको जीतेंगे ।
तथा जगतका हम बनाएंगे । एक ही कौर ॥ ४६० ॥
जगतको हम निगलेंगे । आकाशको धर जलायेंगे ।
तीर पर हम नचायेंगे । विश्वका प्राण ॥ ६१ ॥
ऐसी यह चतुरंग संपदा । करती है महाकालसे स्पर्धा ।
अपने पराक्रमका है मद । करते व्यर्थका ॥ ६२ ॥
बोलते हैं तलवारसे भी तीखा । दीखते हैं आगसे भी दाहक ।
मारनेमें कालकूटसे भी अधिक । भयानक मानते ॥ ६३ ॥
किंतु ये सब गंधर्व-नगर माल । जान तू ये हैं गेडुरीके शोर पोल ।
अथवा सब हैं ये आलेखके फल । दीखते हैं बडे ॥ ६४ ॥
अथवा यह मृगजलमें महापूर । सेना नहीं वस्त्रके सांप बनाकर ।
रखा है यहां बंड सजधजाकर । धनंजय ॥ ६५ ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥
यहां जो संचलित बल । मैंने ग्रास लिया सकल ।
अब चित्रके-से बेताल । निर्वीर्य हैं ये ॥ ६६ ॥
इनका जीवन सूत्र कबका टूट चुका है—
इसीलिये उठ पा ले तू कीर्ति
होके जयी राज्य समृद्ध भोग ।
मैंने हने हैं सब ही कभी के
निमित्त हो केवल सव्यसाची ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७८