ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर ।
डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥
वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान ।
जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥
जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा ।
देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥
आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन ।
पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥
तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार ।
आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥
ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त ।
मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥
संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ ।
तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥
ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत ।
उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना—
ये देव सारे तुझमें समाये
कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त ।
मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत
स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥
३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग