ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृतांतके जो जो हथियार क्रूर । निगलते एकेक स-चराचर ।
निगलता तू ऐसा शस्त्र भांडार । करोडोंका ॥ ९६ ॥
चतुरंग-सेना परिवार । स-अश्व-रथ पकड़कर ।
दांत न लगाते विश्वेश्वर । निगलता तू ॥ ९७ ॥
भीष्मसे ऐसा है कौन । सत्यशौर्यमें प्रवीण ।
तथा जो द्रोण ब्राह्मण । तूने चबाया ॥ ९८ ॥
ओ ! वह सहस्र-कर-कुमार । गयारे गया व्यर्थ जो कर्ण वीर ।
तथा हमारे अनेक महावीर । खा गया तू ॥ ९९ ॥
कैसा हे देव ! यह विधि विधान । मेरी मांगसे विश्व-रूप-दर्शन ।
करता वह विश्वका निकंदन । चाहता था मै शांति ॥ ४०० ॥
तूने कही पहले उपपत्ति । बताई थी यहां कुछ विभूति ।
छोडके वह मैं हो मंदमति । मांगा दर्शन ॥ १ ॥
होनी है जो त्रिकालमें भी नहीं चूकती । बुद्धि भी उसका अनुकरण करती ।
मेरे दैवमें अजी ! यही बात बधीथी । उसका उपाय क्या ? ॥ २ ॥
अमृत भी पहले हाथ आया । देवोंको उससे तोष न भया ।
फिर कालकूटको जन्म दिया । अंतमें जैसे ॥ ३ ॥
किंतु वह था जो किंचित । निराकरण योग्य बात ।
उसे किया है तब शांत । पीके शंभुने ॥ ४ ॥
जलता बवंडर अब कौन लपेटता । विष भरा आकाश कौन निगलता ।
महाकालके कालसे कौन खेलता । सामर्थ्यवान हो ॥ ५ ॥
अर्जुन ऐसे शोकमें गळता । हृदयमें अति संतप्त होता ।
मनोगत वह नहीं जानता । देवदेवेशका यहां ॥ ६ ॥
परमात्मका मनोगत—
कौरव मरते और मैं मारता । अर्जुन ऐसे मोहग्रस्त हुवा था ।
श्रीकृष्णको उसे दूर करना था । यह रूप दिखाके ॥ ७ ॥
३७१ विश्व-रूप-दर्शनयोग