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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 436

वैसे जहां तहां चहूं ओर। तेरे वदन हैं भयंकर।
वहां सिंहसे दांत प्रखर। दीखते क्रोधाग्निसे ॥ ४४ ॥
देख जैसे काल रात्रिका अंधार। करते हैं पिशाच घोर संचार।
वैसे वदनमें प्रलय रुधिर। भरे हैं दांत ॥ ४५ ॥
कालने किया है जैसे युद्ध-निमंत्रण। उन्मत्त हुआ सर्व संहारक मरण।
वैसे दीखते हैं मुखमें भय लक्षण। तेरे आज ॥ ४६ ॥
बेचारे उस त्रिभुवन पर। सहज दृष्टि डाली इक बार।
वह दुःख कालिंदी तट पर। हो गया है वृक्ष ॥ ४७ ॥
रूप है यह महा-मृत्युका सागर। उठते हैं उसमें दुर्वातां भंवर।
त्रैलोक्य-जीवित डोंगी खाती चक्कर। उलटी आंधीमें ॥ ४८ ॥
क्रोधसे तू यदि यह कहता। लोगोंकी बात क्यों व्यर्थ करता।
इसमें तेरा क्या आता जाता। भोग तू ध्यान सुख ॥ ४९ ॥
देव ! लोगोंकी बात क्या साधारण। किया है यह परदा स-कारण।
कांप रहे हैं मेरे स-देहप्राण। देखकर रूप ॥ ३५० ॥
संहार-रुद्र भी घबड़ाता जिससे। मृत्यु भी छिप जाता जिसके डरसे।
ऐसा महाबली मैं कांपता भयसे। ऐसा किया तूने ॥ ५१ ॥
महामारीका यह कराल रूप। भयको जो छिपाने लगता आप।
इसको कहना यदि विश्व-रूप। आश्चर्य है यह ॥ ५२ ॥
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥
आकाश भेदे बहुरंगवाले
खुले मुखोंके विशाल नेत्र।
ज्वलंत तू देव तुझ देख जीव
अधीर होता सुख शांति खोता ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६६