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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 432

मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला ।
कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥
इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत ।
तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥
आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत ।
जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥
इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा ।
करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
जो देख अकुला रहा त्रिलोक —
भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल ।
दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥
तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक ।
गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥
या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त ।
वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥
अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण ।
सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥
सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष
सर्वत्र तू एक हि छा रहा है ।
तेरा यही अद्भुत उग्र रूप
जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३६२