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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 442

अजी कोई किसीको न मारता । मैं ही सबका संहार करता ।
विश्व-रूप निमित्तसे बताता । यहां श्रीहरि ॥ ८ ॥
नहीं जाननेसे यह बात । पार्थ हुवा है व्याकुलचित्त ।
तथा कांपता रहा है व्यर्थ । देखके रूप ॥ ९ ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥
कहता है वह देखकर अर्जुन । कवच सह ये दोनों दल महान ।
खो जाते हैं जैसे गगनमें घन । वैसे जाते मुखमें ॥ ४१० ॥
या अया है अब कल्पांतका अंत । या हुवा है क्रुद्ध विश्वपे कृतांत ।
जो है स्वर्ग पाताळ सह जगत । निगलता आप ॥ ११ ॥
होता जब प्रतिकूल दैव । तब सभी संचित वैभव ।
जहांका तहां ही हो गलात्र । होता नष्ट ॥ १२ ॥
दोनों ओरकी एकत्रित सेना । जाती है मुखमें एक समान ।
किंतु वहांसे कभी लौटना । नहीं दीखता ॥ १३ ॥
अशोकके पात जैसे । चबाता है ऊट वैसे ।
सेना समूह व्यर्थ वैसे । मुखमें जाता ॥ १४ ॥
यहां मुकुट सह मस्तक । दांतोंमें चूर्ण होते अनेक ।
देखता मैं यह भयानक । दृश्य इस रूपमें ॥ १५ ॥
सबको तेरे ये दांत पीस रहे हैं —
जाते त्वरासे मुखमें हि तेरे
भयान जिसमें कराल दाढ ।
चिपके हुए हैं अनेक मुंड
दीखे वहां चून बना हुवा जो ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३७२